भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र ४१-४३ ] अध्याय १ ७७ • निकलकर परमज्योतिःस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो अपने शुद्धरूपसे सम्पन्न हो जाता है।' (छा० उ० ८ । ३ । ४) इसमें भी संप्रसाद नामसे जीवात्मा- का और 'परमज्योति' नामसे परमात्माका भेदपूर्वक निरूपण है। इस प्रकार सुषुप्ति और उत्क्रान्तिकालमे भी जीवात्मा और परमात्माका भेदपूर्वक वर्णन होनेसे उपर्युक्त आकाशशब्द मुक्तात्माका वाचक नहीं हो सकता; क्योंकि मुक्तात्मामे ब्रह्मके सदृश कुछ सद्गुणोंका आविर्भाव होनेपर भी उसमे नाम- रूपात्मक जगत्‌को धारण करनेकी शक्ति नहीं आती। सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं- पत्यादिशब्देभ्यः ॥ १ । ३ । ४३ ॥ पत्यादिशब्देभ्यः = उस परब्रह्मके लिये श्रुतिमे पति, परम पति, परम- महेश्वर आदि विशेष शब्दोका प्रयोग होनेसे भी ( यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मामे भेद है ) । व्याख्या-श्वेताश्वतरोपनिषद् ( ६ । ७ ) मे परमात्माके स्वरूपका इस प्रकार वर्णन आया है- तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ 'ईश्वरोके भी परम महेश्वर, देवताओके भी परमदेवता तथा पतियोंके भी परम पति, अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी एवं स्तवन करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हमलोग सबसे परे जानते हैं।' इस मन्त्रमे देवता आदिकी कोटिमें जीवात्मा है और परम देवता, परम महेश्वर एवं परम पतिके नामसे परमात्माका वर्णन किया गया है। इससे भी यही निश्चय होता है कि जीवात्मा और परमात्मामे भेद है। इसलिये 'आकाश' शब्द परमात्माका ही वाचक है, मुक्त जीवका नहीं। तीसरा पाद सम्पूर्ण ।