ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १-२ ] अध्याय २ १०३ दूसरे महर्षियोंद्वारा बनायी हुई स्मृतियोंको न माननेका दोष उपस्थित हो सकता है; इसलिये वेदानुकूल स्मृतियोंको ही प्रमाण मानना उचित है; न कि वेदके प्रतिकूल अपनी इच्छाके अनुसार बनायी हुई स्मृतिको । दूसरी स्मृतियोंमे स्पष्ट ही परब्रह्म परमेश्वरको जगत्का कारण बताया है । (श्रीमद्भगवद्गीता)* विष्णुपुराण † और मनुस्मृति ‡ आदिमे भी समस्त जगत्की उत्पत्ति परमात्मासे ही बतायी गयी है । इसलिये वास्तवमे श्रुतियोंके साथ स्मृतियोंका कोई विरोध नहीं है । यदि कहीं विरोध हो भी तो वहाँ स्मृतिको छोड़कर श्रुतिके कथनको ही मान्यता देनी चाहिये; क्योंकि वेद और स्मृतिके विरोधमें वेद ही बलवान् माना गया है । सम्बन्ध—सांख्यशास्त्रोक्त 'प्रधान' को जगत्का कारण न माननेमें कोई दोष नहीं है; इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरा कारण उपस्थित करते हैं— इतरेषां चानुपलब्धेः ॥ २ । १ । २ ॥ च=तथा; इतरेषाम्=अन्य स्मृतिकारोंके ( मतमे ); अनुपलब्धेः=प्रधान- कारणवादकी उपलब्धि नहीं होती, इसलिये ( भी प्रधानको जगत्का कारण न मानना उचित ही है ) ।
- एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ( गीता ७ । ६ ) 'पहले कही हुई मेरी परा और अपरा प्रकृतियाँ सम्पूर्ण प्राणियोंकी योनि हैं, ऐसा समझो । तथा मैं जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयका कारण हूँ ।' प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ( गीता ९ । ८ ) 'मैं अपनी प्रकृतिका अवलम्बन करके, प्रकृतिके वशसे विवश हुए इस समस्त भूतसमुदायको बारंबार नाना प्रकारसे रचता हूँ ।' † विष्णोः सकाशादुद्भूतं जगत्तत्रैव च स्थितम् । स्थितिसंयमकत्र्तासौ जगतोऽस्य जगच्च सः ॥ ( वि० पु० १ । १ । ३१ ) 'यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् विष्णुसे उत्पन्न हुआ है और उन्हींमें स्थित है । वे इस जगत्के पालक और संहारकर्ता हैं तथा सम्पूर्ण जगत् उन्हींका स्वरूप है ।' ‡ सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत् ॥ ( मनु० १ । ८ ) 'उन्होंने अपने शरीरसे नाना प्रकारकी प्रजाको उत्पन्न करनेकी इच्छासे सङ्कल्प करके पहले जलकी ही सृष्टि की फिर उस जलमे अपनी शक्तिरूप वीर्यका आधान किया ।'