ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—मनु आदि जो दूसरे स्मृतिकार हैं, उनके ग्रन्थोंमे सांख्यशास्त्रोक्त प्रक्रियाके अनुसार प्रधानको कारण मानने और उससे सृष्टिके होनेका वर्णन नहीं मिलता है; इसलिये इस विषयमें सांख्यशास्त्रको प्रमाण न मानना उचित ही है। सम्बन्ध—'सांख्यकी सृष्टि-प्रक्रियाको योगशास्त्रके प्रवर्तक पातञ्जल भी मानते हैं, अतः उसको मान्यता क्यों न देनी चाहिये ?' इसपर कहते हैं— एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥ २ । १ । ३ ॥ एतेन=इस पूर्वोक्त विवेचनसे; योगः=योगशास्त्रका भी; प्रत्युक्तः=प्रत्युत्तर हो गया । व्याख्या—उपर्युक्त विवेचनसे अर्थात् पूर्वसूत्रोंमे जो कारण बताये गये हैं, उन्हींसे पातञ्जल-योगशास्त्रकी भी उस मान्यताका निराकरण हो गया, जिसमे उन्होंने दृश्य ( जड प्रकृति ) को जगत्का स्वतन्त्र कारण कहा है; क्योंकि अन्य विषयोंमें योगका सांख्यके साथ मतभेद होनेपर भी जड प्रकृतिको जगत्का कारण माननेमें दोनों एकमत हैं; अतः एकके ही निराकरणसे दोनोंका निराकरण हो गया। सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह कहा गया है कि वेदानुकूल स्मृतियोंको ही प्रमाण मानना आवश्यक है, इसलिये वेदविरुद्ध सांख्यस्मृतिको मान्यता न देना अनुचित नहीं है। इसलिये पूर्वपक्षी वेदके वर्णनसे सांख्य-मतकी एकता दिखानेके लिये कहता है— न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥ २ । १ । ४ ॥ न=चेतन ब्रह्म जगत्का कारण नहीं है; अस्य विलक्षणत्वात्=क्योंकि यह कार्यरूप जगत् उस ( कारण ) से विलक्षण ( जड ) है; च=और; तथात्वम्= उसका जड होना; शब्दात्=शब्द ( वेद ) प्रमाणसे सिद्ध है। व्याख्या—श्रुतिमे परब्रह्म परमात्माको सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त आदि लक्षणोंवाला बताया गया है ( तै० उ० २ । १ ) और जगत्को ज्ञानरहित ( तै० उ० २ । ६ ) अर्थात् जड कहा गया है। अतः श्रुति-प्रमाणसे ही 'इसकी परमेश्वरसे विलक्षणता सिद्ध होती है।' कारणसे कार्यका विलक्षण होना युक्तिसंगत नहीं है; इसलिये चेतन परब्रह्म परमात्माको अचेतन जगत्का कारण नहीं मानना चाहिये ।