ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—यह कहना ठीक नहीं है कि उपादानसे उत्पन्न होनेवाला कार्य उससे विलक्षण नहीं हो सकता; क्योकि मनुष्य आदि चेतन व्यक्तियोसे नख-लोम आदि जड वस्तुओकी उत्पत्तिका वर्णन वेदमे देखा जाता है । जैसे, 'यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाक्षरात् संभवतीह विश्वम् ।' ( मु० उ० १ । १ । ७ ) अर्थात् 'जैसे जीवित मनुष्यसे केश और रोएँ उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अविनाशी परब्रह्मसे यह सब जगत् उत्पन्न होता है।' सजीव चेतन पुरुषसे जड नख-लोम आदिकी उत्पत्ति उससे सर्वथा विलक्षण ही तो .है । अतः ब्रह्मको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत तथा श्रुति-स्मृतियोंसे अनुमोदित है । इसमें कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध—इसी विषयमे दूसरी शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ॥ २ । १ । ७ ॥ चेत्=यदि कहो; ( ऐसा माननेसे ) असत्=असत्कार्यवाद अर्थात् जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसी वस्तुकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; प्रतिषेधमात्रत्वात्=क्योंकि वहाँ 'असत्' शब्द प्रतिषेध- मात्रका अर्थात् सर्वथा अभावका बोधक है । व्याख्या—यदि कहो 'अवयवरहित चेतन ब्रह्मसे सावयव जड-वर्गकी उत्पत्ति माननेपर जो वस्तु पहले नहीं थी, उसकी उत्पत्ति माननेका दोष उपस्थित होगा, जो कि श्रुति-प्रमाणके विरुद्ध है, क्योंकि वेदमें असत्से सत्की उत्पत्तिको असंभव बताया गया है।' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ वेदमे कारणसे विलक्षण कार्यकी उत्पत्तिका निषेध नहीं है; अपितु 'असत्'शब्दवाच्य अभावसे भावकी उत्पत्तिको असंभव कहा गया है । वेदान्त शास्त्रमें अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं मानी गयी है; किन्तु सत्स्वरूप सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामे जो जडचेतनात्मक जगत शक्तिरूपसे विद्यमान होते हुए भी अप्रकट रहता .है, उसीका उसके सङ्कल्पसे प्रकट होना उत्पत्ति है । इसलिये परब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति मानना असत्से सत्की उत्पत्ति मानना नहीं है । सम्बन्ध—इसपर पुनः पूर्वपक्षकी ओरसे शङ्का उपस्थित की जाती है— अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ॥ २ । १ । ८ ॥