ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ७-९ ] अध्याय २ १०७ अपीतौ = ( ऐसा माननेपर ) प्रलयकालमे; तद्वत्प्रसङ्गात् = ब्रह्मका उस संसारके जडत्व और सुख-दुःखादि धर्मोंसे युक्त माननेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, इसलिये; असमञ्जसम् = उपर्युक्त मान्यता युक्तिसगत नहीं है । व्याख्या--यदि प्रलयकालमे भी संपूर्ण जगत्का उस परब्रह्म परमात्मामे विद्यमान रहना माना जायगा, तब तो उस ब्रह्मको जड प्रकृतिके जडत्व तथा जीवोंके सुख-दुःख आदि धर्मोंसे युक्त माननेका प्रसङ्ग आ जायगा, जो किसीको मान्य नहीं है; क्योकि श्रुतिमे उस परब्रह्म परमेश्वरको सदैव जडत्व आदि धर्मोंमे रहित, निर्विकार और सर्वथा विशुद्ध बताया गया है । इसलिये उपर्युक्त मान्यता युक्तियुक्त नहीं है । सम्बन्ध--अब सूत्रकार उपर्युक्त शङ्काका निराकरण करते है-- न तु दृष्टान्तभावात् ॥ २ । १ । ९ ॥ (उपर्युक्त वेदसम्मत सिद्धान्तमे ) तु = निःसदेह; न = पूर्वसूत्रमे बताये हुए दोष नहीं हैं; दृष्टान्तभावात् = क्योंकि ऐसे बहुत-से दृष्टान्त उपलब्ध होते है ( जिनसे कारणमे कार्यके विलीन हो जानेपर भी उसमे कार्यके धर्म नहीं रहनेकी बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या--पूर्वसूत्रमें की हुई शङ्का समीचीन नहीं है; क्योकि कार्यके अपने कारणमे विलीन हो जानेके बाद उसके धर्म कारणमे रहते हैं, ऐसा नियम नहीं है; अपितु इसके विपरीत बहुत-से दृष्टान्त मिलते हैं । अर्थात् जब कार्य कारणमे विलीन होता है, तब उसके धर्म भी कारणमे विलीन हो जाते है, ऐसा देखा जाता है । जैसे सुवर्णसे बने हुए आभूषण जब अपने कारणमे विलीन हो जाते हैं, तब उन आभूषणोके धर्म सुवर्णमे नहीं देखे जाते हैं । तथा मिट्टीसे बने हुए घट आदि पात्र जब अपने कारण मृत्तिकामे विलीन हो जाते हैं, तब घट आदिके धर्म उस मृत्तिकामे नहीं देखे जाते हैं । इसी प्रकार और भी बहुत-से दृष्टान्त हैं । इससे यही सिद्ध हुआ कि प्रलयकाल या सृष्टिकालमे और किसी भी अवस्थामे कारण अपने कार्यके धर्मोसे लिप्त नहीं होता है । सम्बन्ध--उपर्युक्त सूत्रमे वादीकी शङ्काका निराकरण किया गया । अब उसके द्वारा उठाये हुए दोषोंकी उसीके मतमें व्याप्ति बताकर अपने मतको निर्दोष सिद्ध करते है--