ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—जो वस्तु वास्तवमे नहीं होती, उसका उत्पन्न होना भी नहीं देखा जाता, जैसे आकाशमे फूल उगना और खरगोशके सींग होना आजतक किसीने नहीं देखा है। इस युक्तिसे तथा बृहदारण्यक आदिमे जो उसके लिये अव्याकृत आदि शब्द प्रयुक्त है, उन शब्दोसे भी यही बात सिद्ध होती है कि 'यह जगत् उत्पन्न होनेसे पहले भी 'सत्' ही था।' सम्बन्ध—अब पुनः उसी बातको कपडेके दृष्टान्तसे सिद्ध करते हैं— पटवच्च ॥ २ । १ । १९ ॥ पटवत्=सूतमे वस्त्रकी भाँति; च=भी ( ब्रह्ममें यह जगत् पहलेसे ही स्थित है )। व्याख्या—जबतक कपड़ा शक्तिरूपसे सूतमे अप्रकट रहता है, तबतक वह नहीं दीखता, वही जब बुननेवालेके द्वारा बुन लिये जानेपर कपड़ेके रूपमे प्रकट हो जाता है, तब अपने रूपमे दीखने लगता है। प्रकट होनेसे पहले और प्रकट होनेके बाद दोनो ही अवस्थाओमे वस्त्र अपने कारणमे विद्यमान है और उससे अभिन्न भी है—इसी प्रकार जगत्को भी समझ लेना चाहिये। वह उत्पत्तिसे पहले भी ब्रह्ममे स्थित है और उत्पन्न होनेके बाद भी उससे पृथक् नहीं हुआ है। सम्बन्ध—इसी बातको प्राण आदिके दृष्टान्तसे समझाते हैं— यथा च प्राणादि ॥ २ । १ । २० ॥ च=तथा; यथा=जैसे; प्राणादि=प्राण और इन्द्रियाँ ( स्थूल शरीरसे बाहर निकलनेपर नहीं दीखतीं तो भी उनकी सत्ता अवश्य रहती है, उसी प्रकार प्रलयकालमे भी अव्यक्तरूपसे जगत्की स्थिति अवश्य है )। व्याख्या—जैसे मृत्युकालमे प्राण और इन्द्रिय आदि जीवात्माके साथ-साथ शरीरसे बाहर अन्यत्र चले जाते हैं, तब उनके स्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती, तथापि उनकी सत्ता अवश्यं है। उसी प्रकार प्रलयकालमे इस जगत्की अप्रकट अवस्था उपलब्ध न होनेपर भी इसकी कारण-रूपमे सत्ता अवश्य है, ऐसा समझना चाहिये। सम्बन्ध—ब्रह्मको जगत्का कारण और जगत्की उसके साथ अनन्यता माननेमें दूसरे प्रकारकी शङ्का उठाकर उसका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—