ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १९-२२ ] अध्याय २ ११५
इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः ॥ २ । १ । २१ ॥ इतरव्यपदेशात्=ब्रह्म ही जीवरूपसे उत्पन्न होता है, ऐसा कहनेसे; हिताकरणादिदोषप्रसक्तिः=( ब्रह्ममे ) अपना हित न करने या अहित करने आदिका दोष आ सकता है । व्याख्या—श्रुतिमे कहा है कि 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' ( छा० उ० ६ । ८ । ७ ) —'हे श्वेतकेतु ! तू वही है।' 'अयमात्मा ब्रह्म' ( बृह० उ० २ । ५ । १९ )— 'यह आत्मा ब्रह्म है ।' तथा 'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत्' ( छा० उ० ६ । ३ । ३ )—अर्थात् 'उस देवता ( ब्रह्म ), ने तेज आदि तत्त्वसे निर्मित शरीरमे इस जीवात्मारूपसे प्रवेश करके नाम- रूपोंको प्रकट किया।' इसके सिवा यह भी कहा गया है कि 'त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी' ( श्वेता० ४ । ३ )—'तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार और कुमारी है।' इत्यादि । इस वर्णनसे स्पष्ट है कि ब्रह्म स्वयं ही जीवरूपसे उत्पन्न हुआ है। इससे ब्रह्ममें अपना हित न करने अथवा अहित करनेका दोष आता है, जो उचित नहीं है; क्योकि जगत्मे ऐसा कोई भी प्राणी नहीं देखा जाता जो कि समर्थ होकर भी दुःख भोगता रहे और अपना हित न करे। यदि वह स्वयं ही जीव बनकर दुःख भोग रहा है, तब तो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका इस प्रकार अपना हित न करना और अहित करना अर्थात् अपनेको जन्म-मरणके चक्करमे डाले रहना आदि अनेक दोष संघटित होने लगेंगे, जो कि सर्वथा अयुक्त हैं; अतः ब्रह्मको जगत्का कारण मानना उचित नहीं है। सम्बन्ध—अब उक्त शङ्काका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥ २ । १ । २२ ॥ तु=किन्तु ( ब्रह्म जीव नहीं है, अपितु उससे ); अधिकम्=अधिक है; भेदनिर्देशात्=क्योंकि जीवात्मासे ब्रह्मका भेद बताया गया है । व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे जनक और याज्ञवल्क्यके संवादका वर्णन है। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि दैवी ज्योतियोका तथा वाणी आदि आध्यात्मिक ज्योतियोंका वर्णन करनेके पश्चात् इनके अभावमे 'आत्मा' को 'ज्योति'