भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 417 में से

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सूत्र ३३-३४ ] अध्याय २ १२५ सम्बन्ध-यदि परब्रह्म परमात्माको जगत्का कारण माना जाय तो उसमें विषमता ( राग-द्वेषपूर्ण भाव ) तथा निर्दयताका दोष आता है; क्योंकि वह देवता आदिको अधिक सुखी और पशु आदिको अत्यन्त दुखी बनाता है तथा मनुष्योंको सुख-दुःखसे परिपूर्ण मध्यम स्थितिमें उत्पन्न करता है । जिन्हें वह सुखी बनाता है, उनके प्रति उसका राग या पक्षपात सूचित होता है और जिन्हें दुखी बनाता है, उनके प्रति उसकी द्वेष-बुद्धि एवं निर्दयता प्रतीत होती है । इस दोषका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति ॥ २ । १ । ३४॥ वैषम्यनैर्घृण्ये = ( परमेश्वरमे ) विषमता और निर्दयताका दोष; न = नहीं आता; सापेक्षत्वात् = क्योंकि वह जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर सृष्टि करता है; तथा हि = ऐसा ही; दर्शयति = श्रुति दिखलाती है । व्याख्या—श्रुतिमें कहा है, 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन ।' ( बृह० उ० ३ । २ । १३ ) अर्थात् 'निश्चय ही यह जीव पुण्य-कर्मसे पुण्य- शील होता—पुण्य-योनिमे जन्म पाता है और पाप-कर्मसे पापशील होता—पाप- योनिमे जन्म ग्रहण करता है ।' 'साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति ।' ( बृह० उ० ४ । ४ । ५ ) अर्थात् 'अच्छे कर्म करनेवाला अच्छा होता है— सुखी एवं सदाचारी कुलमे जन्म पाता है और पाप करनेवाला पापात्मा होता है—पापयोनिमे जन्म ग्रहण करके दुःख उठाता है ।' इत्यादि । इस वर्णनसे स्पष्ट है कि जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर ही परमात्मा उनको कर्मा- नुसार अच्छी-बुरी ( सुखी-दुखी ) योनियोमे उत्पन्न करते है । इसलिये अच्छे न्यायाधीशकी भाँति निष्पक्षभावसे न्याय करनेवाले परमात्मापर विषमता और निर्दयता- रचनामे समर्थ है । उनकी इस अद्भुत शक्तिको देखकर, सुनकर और समझकर भगवदीय सत्ता और उनके गुण-प्रभावपर श्रद्धा-विश्वास बढ़ाने और उनकी शरणमें जानेसे मनुष्य अनायास ही इस भव-बन्धनसे मुक्त हो सकता है । भगवान् सबके सुहृद् हैं, उनकी एक- एक लीला जगत्‌के जीवोंके उद्धारके लिये होती है; इस प्रकार उनकी दिव्य लीलाका रहस्य समझमें आ जानेपर मनुष्यका जगत्‌मे प्रतिक्षण घटित होनेवाली घटनाओके प्रति राग-द्वेषका अभाव हो जाता है; उसे किसी भी बातसे हर्ष या शोक नहीं होता । अतः साधकको इसपर विशेष ध्यान देकर भगवान्‌के भजन-चिन्तनमे संलग्न रहना चाहिये ।

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