ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ का दोष नहीं लगाया जा सकता है। स्मृतियोमे भी जगह-जगह कहा गया है कि जीवको अपने शुभाशुभ कर्मके अनुसार सुख-दुःखकी प्राप्ति होती है। जैसे 'कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।' (गीता १४ । १६) अर्थात् 'पुण्यकर्मका फल सात्त्विक एवं निर्मल बताया गया है।' इसी प्रकार भगवान्ने अशुभ कर्ममे रत रहनेवाले असुर-स्वभावके लोगोको आसुरी योनिमे डालनेकी बात बतायी है।* इन प्रमाणोंसे परमेश्वरमे उपर्युक्त दोषोंका सर्वथा अभाव सिद्ध होता है; अतः उन्हे जगत्का कारण मानना ठीक ही है। सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें कही गयी बातपर शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ २ । १ । ३५ ॥ चेत्=यदि कहो; कर्माविभागात्=जगत्की उत्पत्तिसे पहले जीव और उनके कर्मोंका ब्रह्मसे विभाग नहीं था, इसलिये; न=परमात्मा कर्मोंकी अपेक्षासे सृष्टि करता है, यह कहना नहीं बन सकता; इति न=तो ऐसी-बात नहीं है; अनादित्वात्=क्योकि जीव और उनके कर्म अनादि है। व्याख्या—यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति होनेसे पहले तो एकमात्र सत्स्वरूप परमात्मा ही था† यह बात उपनिषदोमे बार-बार कही गयी है। इससे सिद्ध है कि उस समय भिन्न-भिन्न जीव और उनके कर्मोंका कोई विभाग नहीं था; ऐसी स्थितिमे यह कहना नहीं बनता कि जगत्कर्ता परमात्माने जीवोके कर्मोंकी अपेक्षा रखकर ही भोक्ता, भोग्य और भोग-सामग्रियोके समुदायरूप इस विचित्र जगत्की रचना की है; जिससे परमेश्वरमे विषमता और निर्दयताका दोष न आवे। तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि जीव और उनके कर्म अनादि है। श्रुति कहती है, 'धाता यथापूर्वमकल्पयत्।' परमात्माने पूर्व कल्पके अनुसार सूर्य,
- अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ (गी० १६ । १८-१९) 'जो अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोधका आश्रय ले अपने तथा दूसरोंके शरीरोंमे अन्तर्यामीरूपसे स्थित मुझ परमेश्वरसे द्वेष रखते हैं, निन्दा करते हैं; उन द्वेषी, क्रूर, अशुभकर्मपरायण नीच मनुष्योंको मैं निरन्तर संसारमे आसुरी योनियोंमे ही डालता हूँ।' † 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६ । २ । १)