ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 148, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३५-३६ ] अध्याय २ १२७ चन्द्रमा आदि जगत्की रचना की। इससे जड-चेतनात्मक जगत्की अनादि सत्ता सिद्ध होती है। प्रलयकालमें सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामें विलीन हो जानेपर भी उसकी सत्ता एवं सूक्ष्म विभागका अभाव नहीं होता। उपर्युक्त श्रुतिसे ही यह बात भी सिद्ध है कि जगत्की उत्पत्तिके पहले भी वह अव्यक्त रूपसे उस सर्वशक्तिमान् परमात्मामें है, उसका अभाव नहीं हुआ है। 'लीङ् श्लेषणे' धातुसे लय शब्द बनता है। अतः उसका अर्थ संयुक्त होना या मिलना ही है। उस वस्तुका अभाव हो जाना नहीं। जैसे नमक जलमें घुल-मिल जाता है, तो भी उसकी सत्ता नहीं मिट जाती। उसके पृथक् स्वादकी उपलब्धि होनेके कारण जलसे उसका सूक्ष्म विभाग भी है ही। उसी प्रकार जीव और उनके कर्म प्रलयकालमें ब्रह्मसे अविभक्त रहते हैं तो भी उनकी सत्ता एव सूक्ष्म विभागका अभाव नहीं होता। इसलिये परमात्माको जीवोंके शुभाशुभ कर्मानुसार विचित्र जगत्का कर्ता माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। सम्बन्ध—इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जीव और उनके कर्म अनादि हैं, इसमें क्या प्रमाण है ? इसपर कहते हैं— उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥ २ । १ । ३६ ॥ च=इसके सिवा ( जीव और उनके कर्मोंका अनादि होना ); उपपद्यते=युक्तिसे भी सिद्ध होता है; च=और; उपलभ्यते= ( वेदों तथा स्मृतियोंमें ) ऐसा वर्णन उपलब्ध भी होता है । व्याख्या—जीव और उनके कर्म अनादि हैं, यह बात युक्तिसे भी सिद्ध होती है; क्योकि यदि इनको अनादि नहीं माना जायगा तो प्रलयकालमें परमात्माको प्राप्त हुए जीवोंके पुनरागमन माननेका दोष प्राप्त होगा। अथवा प्रलयकालमें सब जीव अपने आप मुक्त हो जाते हैं, यह स्वीकार करना होगा। इससे शास्त्र और उनमें बताये हुए सब साधन व्यर्थ सिद्ध होंगे, जो सर्वथा अनुचित है। इसके सिवा श्रुति भी बारंबार जीव और उनके कर्मोंको अनादि बताती है। जैसे—'यह जीवात्मा नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता।'* तथा 'वह यह प्रत्यक्ष जगत् उत्पन्न होनेसे पहले नाम-रूपसे प्रकट नहीं था, वही
- अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे । ( क० उ० १ । २ । १८ )