ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 149, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ पीछे प्रकट किया गया।' (बृ० उ० १ । ४ । ७) 'परमात्माने शरीरकी रचना करके उसमें इस जीवात्माके सहित प्रवेश किया।' (तै० उ० २ । ७) इत्यादि । इन सब वर्णनोंसे जीवात्मा और यह जगत् अनादि सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार स्मृतिमें भी स्पष्ट कहा गया है कि 'पुरुष (जीवसमुदाय) और प्रकृति (स्वभाव, जिसमें जीवोंके कर्म भी संस्काररूपमें रहते हैं)—इन दोनोंको ही अनादि समझो।' (गीता १३ । १९) इस प्रकार जीव और उनके कर्म अनादि सिद्ध होनेसे उनका विभक्त होना अनिवार्य है; अतः कर्मोंकी अपेक्षासे परमेश्वरको इस विचित्र जगत्का कर्ता माननेमे कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—अपने पक्षमें अविरोध (विरोधका अभाव) सिद्ध करनेके लिये आरम्भ किये हुए इस पहले पादका उपसंहार करते हुए सूत्रकार कहते हैं— सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥ २ । १ । ३७ ॥ सर्वधर्मोपपत्तेः=(इस जगत्कारण परब्रह्ममे) सब धर्मोकी सङ्गति है, इसलिये; च=भी (किसी प्रकारका विरोध नहीं है)। व्याख्या—इस जगत्कारणरूप परब्रह्म परमात्मामें सभी धर्मोंका होना सङ्गत है; क्योंकि वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वधर्मा, सर्वाधार और सब कुछ बननेमें समर्थ है। इसीलिये वह सगुण भी है और निर्गुण भी। समस्त जगद्व्यापारसे रहित होकर भी सब कुछ करनेवाला है। वह व्यक्त भी है और अव्यक्त भी। उस सर्वधर्माश्रय परब्रह्म परमेश्वरके लिये कुछ भी दुष्कर या असम्भव नहीं है। इस प्रकार विवेचन करनेसे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मको जगत्का कारण माननेमें कोई भी दोष या विरोध नहीं है। इस पादमें आचार्य बादरायणने प्रधानतः अपने पक्षमे आनेवाले दोषोंका निराकरण करते हुए अन्तमे जीव और उनके कर्मोंको अनादि बतलाकर इस जगत्की अनादि-सत्ता तथा सत्कार्यवादकी सिद्धि की है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ग्रन्थकार परमेश्वरको केवल निर्गुण, निराकार और निर्विशेष ही नहीं मानते; किन्तु सर्वज्ञता आदि सब धर्मोंसे सम्पन्न भी मानते हैं। पहला पाद सम्पूर्ण