भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र ८-१० ] अध्याय २ १३५ व्याख्या—यदि गुणोंकी साम्यावस्थाका भंग होना काल आदि अन्य निमित्तोंसे मान लिया जाय तो भी प्रधानमे ज्ञानशक्तिका अभाव तो है ही। इसलिये उसके द्वारा बुद्धिपूर्वक कोई रचना नहीं हो सकती। जैसे गृह, वस्त्र, घट आदिका निर्माण कोई समझदार चेतन कर्ता ही कर सकता है, उसी प्रकार अनन्तकोटि ब्रह्माण्डके अन्तर्गत असंख्य जीवोंके छोटे-बड़े विविध शरीर एवं अन्न आदिकी बुद्धिपूर्वक होनेवाली सृष्टि जड प्रकृतिके द्वारा असम्भव है। ऐसी रचना तो सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सनातन परमात्मा ही कर सकता है; अतः जड प्रकृतिको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—अब सांख्यदर्शनकी असमीचीनता बताते हैं— विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ॥ २ । २ । १० ॥ विप्रतिषेधात् = परस्पर विरोधी बातोंका वर्णन करनेसे; च = भी; असमञ्जसम् = सांख्यदर्शन समीचीन नहीं है। व्याख्या—सांख्यदर्शनमे बहुत-सी परस्पर-विरुद्ध बातोंका वर्णन पाया जाता है। जैसे पुरुषको असङ्ग^१ और निष्क्रिय^२ मानना फिर उसीको प्रकृतिका द्रष्टा^३ और भोक्ता^४ बताना, प्रकृतिके साथ उसका संयोग^५ कहना, प्रकृतिको पुरुषके लिये भोग और मोक्ष^६ प्रदान करनेवाली बताना, तथा प्रकृति और पुरुषके नित्य पार्थक्यके ज्ञानसे दुःखका अभाव ही मोक्ष^७ है; ऐसा मुक्तिका स्वरूप मानना इत्यादि। इस कारण भी सांख्यदर्शन समीचीन ( निर्दोष ) नहीं जान पड़ता है। सम्बन्ध—उपर्युक्त दस सूत्रोंमे सांख्यशास्त्रकी समीक्षा की गयी। अब वैशेषिकोंके परमाणुवादका खण्डन करनेके लिये उनकी मान्यताको असंगत बताते हुए दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं— १. असङ्गोऽयं पुरुष इति । ( सा० सू० १ । १५ ) २. निष्क्रियस्य तदसंभवात् । ( सा० सू० १ । ४९ ) ३. द्रष्टृत्वादिरात्मनः करणत्वमिन्द्रियाणाम् । ( सा० सू० २ । २९ ) ४. भोक्तृभावात् । ( सां० सू० १ । १४३ ) ५. न नित्यशुद्धमुक्तस्वभावस्य तद्योगस्तद्योगादृते । ( सा० सू० १ । १९ ) ६. पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । ( सांख्यकारिका २१ ) ७. विवेकात्रिःशेषदुःखनिवृत्तौ कृतकृत्यता नेतराव्न्नेतरात् । ( सा० सू० ३ । ८४ )