भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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१३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ॥ २ । २ । ११ ॥ ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् = ह्रस्व ( द्व्यणुक ) तथा परिमण्डल ( परमाणु ) से; महद्दीर्घवत् = महत् एवं दीर्घ ( त्र्यणुक ) की उत्पत्ति बतानेकी भाँति; वा = ही ( वैशेषिकोंके द्वारा प्रतिपादित सभी बातें असमञ्जस—असंगत ) हैं। व्याख्या—परमाणुकारणवादी वैशेषिकोंकी मानी हुई प्रक्रिया इस प्रकार है—एक द्रव्य सजातीय दूसरे द्रव्यको और एक गुण सजातीय दूसरे गुणको उत्पन्न करता है। समवायी, असमवायी और निमित्त तीनों कारणोंसे कार्यकी उत्पत्ति होती है। जैसे वस्त्रकी उत्पत्तिमे तन्तु ( सूत ) तो समवायिकारण हैं, तन्तुओंका परस्पर संयोग असमवायिकारण है और तुरी, वेमा तथा वस्त्र बुननेवाला कारीगर आदि निमित्तकारण है। परमाणुके चार भेद हैं—पार्थिव परमाणु, जलीय परमाणु, तैजस परमाणु तथा वायवीय परमाणु। ये परमाणु नित्य, निरवयव तथा रूपादि गुणोंसे युक्त हैं। इनका जो परिमाण ( माप ) है, उसे पारिमाण्डल्य कहते है। प्रलयकालमें ये परमाणु कोई भी कार्य आरम्भ न करके यों ही स्थित रहते हैं। सृष्टिकालमें कार्यसिद्धिके लिये परमाणु तो समवायिकारण बनते हैं, उनका एक दूसरेसे संयोग असमवायिकारण होता है, अदृष्ट या ईश्वर- की इच्छा आदि उसमें निमित्तकारण बनते हैं। उस समय भगवान्‌की इच्छासे पहला कर्म वायवीय परमाणुओंमें प्रकट होता है, फिर एक दूसरेका संयोग होता है। दो परमाणु संयुक्त होकर एक द्व्यणुकरूप कार्यको उत्पन्न करते हैं। तीन द्व्यणुकोंसे त्र्यणुक उत्पन्न होता है। चार त्र्यणुकोंसे चतुरणुककी उत्पत्ति होती है। इस क्रमसे महान् वायुतत्त्व प्रकट होता है और वह आकाशमे वेगसे बहने लगता है। इसी प्रकार तैजस परमाणुओंसे अग्निकी उत्पत्ति होती है और वह प्रज्वलित होने लगता है। जलीय परमाणुओंसे जलका महासागर प्रकट होकर उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त दिखायी देता है तथा इसी क्रमसे पार्थिव परमाणुओंसे यह बड़ी भारी पृथिवी उत्पन्न होती है। मिट्टी और प्रस्तर आदि इसका स्वरूप है। यह अचल भावसे स्थित होती है। कारणके गुणोंसे ही कार्यके गुण उत्पन्न होते हैं। जैसे तन्तुओंके शुक्ल, नील, पीत आदि गुण ही वस्त्रमें वैसे गुण प्रकट करते हैं। इसी प्रकार परमाणुगत शुक्ल आदि गुणोंसे ही द्व्यणुकगत शुक्ल आदि गुण प्रकट होते हैं। द्व्यणुकके आरम्भक ( उत्पादक ) जो दो परमाणु है, उनकी वह द्वित्व संख्या द्व्यणुकमें अणुत्व और ह्रस्वत्व—इन दो परिमाणान्तरोंका आरम्भ