ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ११-१२ ] अध्याय २ १३७ ( आविर्भाव ) करती है । परन्तु विभिन्न परमाणुमे जो पृथक्-पृथक् पारिमाण्डल्य- नामक परिमाण होता है, वह द्व्यणुकमे दूसरे पारिमाण्डल्यको नहीं प्रकट करता है, क्योकि वैसा करनेपर वह कार्य पहलेसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होने लगेगा । इसी प्रकार संहारकालमें भी परमेश्वरकी इच्छासे परमाणुओंमें कर्म प्रारम्भ होता है, इससे उनके पारस्परिक संयोगका नाश होता है, फिर द्व्यणुक आदिका नाश होते-होते पृथिवी आदिका भी नाश हो जाता है । वैशेषिकोंकी इस प्रक्रियाका सूत्रकार निराकरण करते हुए कहते हैं कि यदि कारणके ही गुण कार्यमे प्रकट होते हैं, तब तो परमाणुका गुण जो पारिमाण्डल्य ( अत्यन्त सूक्ष्मता ) है, वही द्व्यणुकमे भी प्रकट होना उचित है; पर ऐसा नहीं होता । उनके ही कथनानुसार दो परमाणुओंसे ह्रस्वगुणविशिष्ट द्व्यणुककी उत्पत्ति होती है और ह्रस्व द्व्यणुकोसे महत् दीर्घ परिमाणवाले त्र्यणुक- की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार जैसे यहाँ वैशेषिकोंकी मान्यता असङ्गत है, उसी प्रकार उनके द्वारा कही जानेवाली अन्य बाते भी असङ्गत हैं । सम्बन्ध—इसी बातको स्पष्ट करते हैं— उभयथापि न कर्मात्तस्तदभावः ॥ २ । २ । १२ ॥ उभयथा=दोनो प्रकारसे; अपि=ही; कर्म=परमाणुओंमें कर्म होना; न=नहीं सिद्ध होता; अतः=इसलिये; तदभावः=परमाणुओंके संयोगपूर्वक द्व्यणुक आदिकी उत्पत्तिके क्रमसे जगत्का जन्म आदि होना सम्भव नहीं है । व्याख्या—परमाणुवादियोंका कहना है कि 'सृष्टिके पूर्व परमाणु निश्चल रहते है, उनमे कर्म उत्पन्न होकर परमाणुओंका संयोग होता है और उससे जगत्की उत्पत्ति होती है।' इसपर सूत्रकार कहते हैं कि यदि उन परमाणुओंमे कर्मका सञ्चार विना किसी निमित्तके अपने-आप हो जाता है, ऐसा माने तो यह असम्भव है; क्योंकि उनके मतानुसार प्रलयकालमे परमाणु निश्चल माने गये है । यदि ऐसा मानें कि जीवोंके अदृष्ट कर्मसंस्कारोंसे परमाणुओंमे कर्मका सञ्चार हो जाता है तो यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि जीवोंका अदृष्ट तो उन्हींमे रहता है न कि परमाणुओंमे; अतः वह उनमे कर्मका सञ्चार नहीं कर सकता । उक्त दोनो प्रकारसे ही परमाणुओंमे कर्म होना सिद्ध नहीं होता; इसलिये परमाणुओंके मयोगये जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।