ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ इसके सिवा, अदृष्ट अचेतन है। कोई भी अचेतन वस्तु किसी चेतनका सहयोग प्राप्त किये बिना न तो स्वयं कर्म कर सकती है और न दूसरेसे ही करा सकती है। यदि कहें, जीवके शुभाशुभ कर्मसे ही अदृष्ट बनता है, अतः जीवात्माकी चेतनता उसके साथ है तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि सृष्टिके पहले जीवात्माकी चेतनता जाग्रत् नहीं है, अतः वह अचेतनके ही तुल्य है। इसके सिवा, जीवात्मामें ही अदृष्टकी स्थिति स्वीकार करनेपर वह परमाणुओंमें क्रिया- शीलता उत्पन्न करनेमें निमित्त नहीं बन सकता; क्योंकि परमाणुओंसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार किसी नियत निमित्तके न होनेसे परमाणुओंमें पहला कर्म नहीं उत्पन्न हो सकता। उस कर्म या क्रियाशीलताके बिना उनका परस्पर संयोग नहीं हो सकेगा। संयोग न होनेसे द्व्यणुक आदिकी उत्पत्तिके क्रमसे जगत्की सृष्टि और प्रलय भी न हो सकेंगे। सम्बन्ध—परमाणु-कारणवादके खण्डनके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः ॥ २ । २ । १३ ॥ समवायाभ्युपगमात् = परमाणुवादमें समवाय-सम्बन्धको स्वीकार किया गया है, इसलिये; च = भी (परमाणुकारणवाद सिद्ध नहीं हो सकता); साम्यात् = क्योंकि कारण और कार्यकी भाँति समवाय और समवायीमें भी भिन्नताकी समानता है, इसलिये; अनवस्थितेः = उनमें अनवस्थादोषकी प्राप्ति हो जानेपर परमाणुओंके संयोगसे जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकेगी। व्याख्या—वैशेषिकोंकी मान्यताके अनुसार युतसिद्ध अर्थात् अलग-अलग रह सकनेवाली वस्तुओंमें परस्पर संयोग-सम्बन्ध होता है और अयुतसिद्ध अर्थात् अलग-अलग न रहनेवाली वस्तुओंमें समवाय-सम्बन्ध होता है। रज्जु (रस्सी) और घट—ये युतसिद्ध वस्तुएँ हैं, अतः इनमें संयोग-सम्बन्ध ही स्थापित हो सकता है। तन्तु और वस्त्र—ये अयुतसिद्ध वस्तुएँ हैं; अतः इनमें सदा समवाय- सम्बन्ध रहता है। यद्यपि कारणसे कार्य अत्यन्त भिन्न है तो भी उनके मतमे समवायि कारण और कार्यका पारस्परिक सम्बन्ध 'समवाय' कहा गया है। इसके अनुसार दो अणुओंसे उत्पन्न होनेवाला 'द्व्यणुक' नामक कार्य उन अणुओंसे भिन्न होकर भी समवाय-सम्बन्धके द्वारा उनसे सम्बद्ध होता है, ऐसा मान लेनेपर, जैसे द्व्यणुक उन अणुओंसे भिन्न है, उसी प्रकार 'समवाय' भी समवायीसे भिन्न है।