ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ विज्ञानको ही प्रत्यक्ष मानता है और उसके द्वारा घटादि पदार्थोंकी सत्ताका अनुमान करता है। योगाचारके मतमे 'निरालम्बन विज्ञान' मात्रकी ही सत्ता है, बाह्य पदार्थ स्वप्नमें देखी जानेवाली वस्तुओंकी भाँति मिथ्या है। माध्यमिक सबको शून्य ही मानता है। उसके मतमे दीप-शिखाकी भाँति संस्कारवश क्षणिक विज्ञानकी धारा ही बाह्य पदार्थोंके रूपमे प्रतीत होती है। जैसे दीपककी शिखा प्रतिक्षण मिट रही है, फिर भी एक धारा-सी बनी रहनेके कारण उसकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार बाह्य पदार्थ भी प्रतिक्षण नष्ट हो रहे हैं, उनकी विज्ञान- धारा मात्र प्रतीत होती है। जैसे तैल चुक जानेपर दीपशिखा बुझ जाती है, उसी प्रकार संस्कार नष्ट होनेपर विज्ञान-धारा भी शान्त हो जाती है। इस प्रकार अभाव या शून्यताकी प्राप्ति ही उसकी मान्यताके अनुसार अपवर्ग या मुक्ति है। इस सूत्रमे वैभाषिक तथा सौत्रान्तिकके मतको एक मानकर उसका निराकरण किया जाता है। उन दोनोंकी मान्यताका स्वरूप इस प्रकार है— रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा तथा संस्कार—ये पाँच स्कन्ध हैं। पृथिवी आदि चार भूत तथा भौतिक वस्तुएँ—शरीर, इन्द्रिय और विषय—ये 'रूपस्कन्ध' कहलाते है। पार्थिव परमाणु रूप, रस, गन्ध और स्पर्श—इन चार गुणोंसे युक्त एवं कठोर स्वभाववाले होते हैं; वे ही समुदायरूपमे एकत्र हो पृथिवीके आकार- में संगठित होते है। जलीय परमाणु रूप, रस और स्पर्श इन तीनोंसे युक्त एवं स्निग्ध स्वभावके होते हैं; वे ही जलके आकारमे संगठित होते हैं। तेजके परमाणु रूप और स्पर्श गुणसे युक्त एवं उष्ण स्वभाववाले है; वे अग्निके आकारमे संगठित हो जाते है। वायुके परमाणु स्पर्शकी योग्यतावाले एवं गतिशील होते हैं; वे ही वायुरूपमे संगठित होते हैं। फिर पृथिवी आदि चार भूत शरीर, इन्द्रिय और विषयरूपमे संगठित होते है। इस तरह ये चार प्रकार- के क्षणिक परमाणु हैं, जो भूत-भौतिक संघातकी उत्पत्तिमे कारण बनते हैं। यह परमाणुहेतुक भूत-भौतिकवर्ग ही रूपस्कन्ध एवं बाह्यसमुदाय कहलाता है। विज्ञानस्कन्ध कहते है आभ्यन्तरिक विज्ञानके प्रवाहको। इसीमे 'मैं' की प्रतीति होती है। यही घट-ज्ञान, पट-ज्ञान आदिके रूपमे अविच्छिन्न धाराकी भाँति स्थित हैं। इसीको कर्ता, भोक्ता और आत्मा कहते है। इसीसे सारा लौकिक व्यवहार चलता है। सुख-दुःख आदिकी अनुभूतिका नाम वेदना स्कन्ध है। उपलक्षणसे जो वस्तुकी प्रतीति करायी जाती है, जैसे ध्वजसे गृहकी और दण्डसे पुरुषकी,