ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १९] अध्याय २ १४३ उसीका नाम संज्ञास्कन्ध है। राग, द्वेष, मोह, मद, मात्सर्य, भय, शोक और विषाद आदि जो चित्तके धर्म हैं, उन्हींको संस्कारस्कन्ध कहते हैं। विज्ञान आदि चार स्कन्ध चित्त-चैत्तिक कहलाते हैं। विज्ञानस्कन्धरूप चित्तका नाम ही आत्मा हैं; शेष तीन स्कन्ध 'चैत्य' अथवा 'चैत्तिक' हैं। ये सब प्रकारके व्यवहारोंका आश्रय बनकर अन्तःकरणमे संगठित होते हैं। यह चारों स्कन्धोंका समुदाय या चित्त-चैत्तिक वर्ग 'आभ्यन्तर समुदाय' कहा गया है। इन दोनो समुदायोंसे भिन्न और किसी वस्तु (आत्मा, आकाश आदि) की सत्ता ही नहीं है। ये ही दोनों बाह्य और आभ्यन्तर समुदाय समस्त लोक-व्यवहारके निर्वाहक हैं। इनसे ही सब कार्य चल जाता है, इसलिये नित्य 'आत्मा' को माननेकी आवश्यकता ही नहीं है। इसके उत्तरमें कहा जाता है कि परमाणु जिसमे हेतु बताये गये हैं, वह भूत-भौतिक बाह्य-समुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर-समुदाय—ये दोनो प्रकारके समुदाय तुम्हारे कथनानुसार मान लिये जायं तो भी उक्त समुदायकी सिद्धि असम्भव ही है; क्योंकि समुदायके अन्तर्गत जो वस्तुएँ हैं, वे सब अचेतन हैं, एक-दूसरेकी अपेक्षासे शून्य हैं। अतः उनके द्वारा समुदाय अथवा संघात बना लेना असम्भव है। परमाणु आदि सभी वस्तुएँ तुम्हारी मान्यताके अनुसार क्षणिक भी हैं। एक क्षणमे जो परमाणु है, वे दूसरे क्षणमें नहीं है। फिर वे क्षणविध्वंसी परमाणु और पृथिवी आदि भूत इस समुदाय या संघातके रूपमे एकत्र होनेका प्रयत्न कैसे कर सकते है, कैसे उनका संघात बन सकता है अर्थात् किसी प्रकार और कभी भी नहीं बन सकता; इसलिये उनके सघात- पूर्वक जगत्-उत्पत्तिकी कल्पना करना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है; अतः वैभाषिक और सौत्रान्तिकोंका मत मानने योग्य नहीं है। सम्बन्ध—पूर्वपक्षीकी ओरसे दिये जानेवाले समाधानका स्वयं उल्लेख करके सूत्रकार उसका खण्डन करते हैं— इतरेतरप्रत्ययत्वादिति चेन्नोत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् ॥२।२।१९॥ चेत्=यदि कहो; इतरेतरप्रत्ययत्वात् =अविद्या, संस्कार, विज्ञान आदि- मेसे एक-एक दूसरे-दूसरेके कारण होते है, अतः इन्हींसे समुदायकी सिद्धि हो सकती है; इति न=तो यह ठीक नहीं है; उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् =क्योंकि