भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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१४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ नहीं हैं, ये अभावमात्र हैं। निरोध तो विनाशका बोधक होनेसे अभाव है ही, आकाश भी आवरणका अभावमात्र ही है। इनमेंसे आकाशकी अभावरूपताका निराकरण तो २४ वें सूत्रमें किया जायगा। यहाँ उनके माने हुए दो प्रकारके निरोधोंका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिरविच्छेदात् ॥ २ । २ । २२ ॥ प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिः = प्रतिसंख्यानिरोध और अप्रतिसंख्या- निरोध—इन दो प्रकारके निरोधोंकी सिद्धि नहीं हो सकती; अविच्छेदात् = क्योकि संतान ( प्रवाह ) का विच्छेद नहीं होता। व्याख्या—उनके मतमे जो बुद्धिपूर्वक सहेतुक विनाश है, उसका नाम प्रतिसंख्या-निरोध है। यह तो पूर्णज्ञानसे होनेवाले आत्यन्तिक प्रलयका बोधक है। दूसरा जो स्वभावसे ही बिना किसी निमित्तके अबुद्धिपूर्वक विनाश होता है, उसका नाम अप्रतिसंख्या-निरोध है। यह स्वाभाविक प्रलय है। यह दोनो प्रकार- का निरोध—किसी वस्तुका न रहना सिद्ध नहीं हो सकता; क्योकि वे समस्त पदार्थोंको प्रतिक्षण विनाशशील मानते हैं और असत् कारणोंसे 'सत्' कार्यकी उत्पत्ति भी प्रतिक्षण स्वीकार करते हैं। इस मान्यताके अनुसार एक पदार्थका नाश और दूसरेकी उत्पत्तिका क्रम विद्यमान रहनेसे दोनोकी परम्परा निरन्तर चलती ही रहेगी। इसके रुकनेका कोई भी कारण उनकी मान्यताके अनुसार नहीं है। इसलिये किसी प्रकारके निरोधकी सिद्धि नहीं होगी। सम्बन्ध—बौद्धमतवाले ऐसा मानते है कि सब पदार्थ क्षणिक और असत्य होते हुए भी भ्रान्तिरूप अविद्याके कारण स्थिर और सत्य प्रतीत होते हैं। ज्ञानके द्वारा अविद्याका अभाव होनेसे सबका अभाव हो जाता है। इस प्रकार बुद्धिपूर्वक निरोधकी सिद्धि होती है। इसका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— उभयथा च दोषात् ॥ २ । २ । २३ ॥ उभयथा=दोनो प्रकारसे; च=भी; दोषात्=दोष आता है, इसलिये ( उनकी मान्यता युक्तिसंगत नहीं है )। व्याख्या—यदि यह माना जाय कि भ्रान्तिरूप अविद्यासे प्रतीत होनेवाला यह जगत् पूर्ण ज्ञानसे अविद्याका नाश होनेपर उसीके साथ नष्ट हो जाता है;