भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र २२-२५ ] अध्याय २ १५७ तब तो जो बिना कारणके अपने आप विनाश—सब पदार्थोंका अभाव माना गया है, उस अप्रतिसंख्यानिरोधकी मान्यतामे विरोध आवेगा तथा यदि यह माना जाय कि भ्रान्तिमे प्रतीत होनेवाला जगत् बिना पूर्ण ज्ञानके अपने-आप नष्ट हो जाता है. तब ज्ञान और उसके साधनका उपदेश व्यर्थ होगा । अत उनका मत किसी प्रकार भी युक्तिसङ्गत नहीं है । सम्बन्ध—अब आकाश कोई पदार्थ नहीं, किंतु आवरणका अभावमात्र है, ' इस मान्यताका खण्डन करते हैं— आकाशे चाविशेषात् ॥ २ । २ । २४ ॥ आकाशे=आकाशके विषयमे; च=भी, उनकी मान्यता ठीक नहीं है, अविशेषात्=क्योकि अन्य भाव-पदार्थोंसे उसमे कोई विशेषता नहीं है । व्याख्या—पृथिवी, जल आदि जितने भी भाव-पदार्थ देखे जाते हैं, उन्हींकी भाँति आकाश भी भावरूप है । आकाशकी भी सत्ताका सबको , बोध होता है । पृथिवी गन्धका. जल रसका, तेज रूपका तथा वायु स्पर्शका आश्रय है; इसी प्रकार शब्दका भी कोई आश्रय होना चाहिये । आकाश ही उसका आश्रय है; आकाशमे ही शब्दका श्रवण होता है । यदि आकाश न हो तो शब्दका श्रवण ही नहीं हो सकता । प्रत्येक वस्तुके लिये आधार और अवकाश ( स्थान ) चाहिये । आकाश ही शेष चार भूतोका आधार है तथा वही सम्पूर्ण जगत्‌को अवकाश देता है । इससे भी आकाशकी सत्ता प्रत्यक्ष है । पक्षी आकाशमे चलनेके कारण ही खग या विहग कहलाते है । कोई भी भाव-पदार्थ अभावमे नहीं विचरण करता है । श्रुतिने परमात्मासे आकाशकी उत्पत्ति स्पष्ट शब्दोमे स्वीकार की है—'आत्मन आकाश. सम्भूत:' ।' ( तै० उ० २ । १ ) । इस प्रकार युक्ति तथा प्रमाणसे भी आकाशकी सत्ता सिद्ध है, कोई ऐसा विशेष कारण नहीं है, जिससे आकाशको भावरूप न माना जा सके । अत: आकाशकी अभावरूपता किसी प्रकार सिद्ध न होनेके कारण बौद्धोकी मान्यता युक्तिसङ्गत नहीं है । सम्बन्ध—बौद्धोंके मतमे 'आत्मा' भी नित्य वस्तु नहीं, क्षणिक है; अतः उनकी इस मान्यताका खण्डन करते हुए कहते हैं— अनुस्मृतेश्च ॥ २ । २ । २५ ॥