भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र २९-३२ ] अध्याय २ १५१ करनेसे उनकी उपलब्धि नहीं होगी और उपलब्धि सिद्ध हुए बिना पूर्व अनुभवके अनुसार वासनाका होना सिद्ध नहीं होगा । इसलिये विज्ञानवादियोंकी मान्यता ठीक नहीं है । बाह्य पदार्थोंको सत्य मानना ही युक्तिसङ्गत है । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे वासनाका खण्डन करते हैं— क्षणिकत्वाच्च ॥ २ । २ । ३१ ॥ क्षणिकत्वात्=बौद्धमतके अनुसार वासनाकी आधारभूता बुद्धि भी क्षणिक है, इसलिये; च=भी ( वासनाकी सत्ता सिद्ध नहीं होती ) । व्याख्या—वासनाकी आधारभूता जो बुद्धि है, उसे भी विज्ञानवादी क्षणिक मानते हैं । इसलिये वासनाके आधारकी स्थिर सत्ता न होनेके कारण निराधार वासनाका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता, इसलिये भी बौद्धमत भ्रान्तिपूर्ण है । सम्बन्ध—अब सूत्रकार बौद्धमतमें सब प्रकारकी अनुपपत्ति होनेके कारण उसकी अनुपयोगिता सूचित करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं— सर्वथानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ३२ ॥ ( विचार करनेपर बौद्धमतमे ) सर्वथा=सब प्रकारसे; अनुपपत्तेः=अनुपपत्ति ( असङ्गति ) दिखायी देती है, इसलिये; च=भी ( बौद्धमत उपादेय नहीं है ) । व्याख्या—बौद्धमतकी मान्यताओंपर जितना ही विचार किया जाता है, उतना ही उनकी प्रत्येक बात युक्तिविरुद्ध जान पड़ती है । बौद्धोंकी प्रत्येक मान्यताका युक्तियोंसे खण्डन हो जाता है, अतः वह कदापि उपादेय नहीं है । यहाँ सूत्रकारने प्रसङ्गका उपसंहार करते हुए माध्यमिक बौद्धोंके सर्वशून्यत्रादका भी खण्डन कर दिया—यह बात इसीके अन्तर्गत समझ लेनी चाहिये । तात्पर्य यह कि क्षणिकत्राद और विज्ञानवादका जिन युक्तियोंसे खण्डन किया गया है, उन्हींके द्वारा सर्वशून्यत्रादका भी खण्डन हो गया; ऐसा मानना चाहिये । सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धमतका निराकरण करके अब जैनमतका खण्डन करने- के लिये नया प्रकरण आरम्भ करते हैं। जैनीलोग सप्तभङ्गी-न्यायके अनुसार एक ही पदार्थकी सत्ता और असत्ता दोनों स्वीकार करते हैं; उनकी इस मान्यताका निराकरण करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं—