ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 173, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ नैकस्मिन्नसंभवात् ॥ २ । २ । ३३ ॥ एकस्मिन् = एक सत्य पदार्थमें; न = परस्पर-विरुद्ध अनेक धर्म नहीं रह सकते; असंभवात् = क्योंकि यह असम्भव है। व्याख्या—जैनीलोग सात पदार्थ* और पञ्च अस्तिकाय† मानते है और सर्वत्र सप्तभङ्गी-न्यायकी अवतारणा करते हैं। उनकी मान्यताके अनुसार सप्तभङ्गी-न्यायका स्वरूप इस प्रकार है— १ स्यादस्ति ( सम्भव है, पदार्थकी सत्ता हो ), २ स्यान्नास्ति ( सम्भव है, उसकी सत्ता न हो ), ३ स्यादस्ति च नास्ति च ( हो सकता है कि पदार्थकी सत्ता हो भी और न भी हो ), ४ स्यादवक्तव्यः ( सम्भव है, वह कहने या वर्णन करने योग्य न हो ), ५ स्यादस्ति चावक्तव्यश्च ( सम्भव है, उसकी सत्ता हो, पर वह वर्णन करने योग्य न हो ), ६ स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च ( सम्भव है, उसकी सत्ता भी न हो और वह वर्णन करने योग्य भी न हो ) तथा ७ स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यश्च ( सम्भव है, उसकी सत्ता हो, न भी हो और वह वर्णन करनेके योग्य भी न हो )। इस तरह वे प्रत्येक पदार्थके विषयमे विकल्प रखते हैं। सूत्रकारने इस सूत्रके द्वारा इसीका निराकरण किया है। उनका कहना है कि जो एक सत्य पदार्थ है, उसके प्रकारभेद तो हो सकते हैं; परन्तु उसमें विरोधी धर्म नहीं हो सकते। जो वस्तु है, उसका अभाव नहीं हो सकता। जो नहीं है, उसकी विद्यमानता नहीं हो सकती। जो नित्य पदार्थ है, वह नित्य ही है, अनित्य नहीं है। जो अनित्य है, वह अनित्य ही है, नित्य नहीं है। इसी प्रकार समझ लेना चाहिये। अतः जैनियोंका प्रत्येक वस्तुको विरुद्ध धर्मोंसे युक्त मानना युक्ति- संगत नहीं है। सम्बन्ध—जैनीलोगोंकी दूसरी मान्यता यह है कि आत्माका माप शरीरके बराबर है, उसमें दोष दिखाते हुए सूत्रकार कहते हैं— एवं चात्माकात्स्न्र्यम् ॥ २ । २ । ३४ ॥ एवं च = इसी प्रकार; आत्माकात्स्न्र्यम् = आत्माको अपूर्ण—एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी युक्तिसङ्गत नहीं है।
- उनके बताये हुए सात पदार्थ इस प्रकार हैं—जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जर, बन्ध और मोक्ष। † पाँच अस्तिकाय इस प्रकार है—जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय तथा आकाशास्तिकाय।