ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३३-३५ ] अध्याय २ १५३ व्याख्या--जिस प्रकार एक पदार्थमें विरुद्ध धर्मोंको मानना युक्तिसङ्गत नहीं है, उसी प्रकार आत्माको एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी युक्तिसङ्गत नहीं है; क्योकि किसी मनुष्यशरीरमे रहनेवाले आत्माको यदि उसके कर्मवश कभी चींटीका शरीर प्राप्त हो तो वह उसमे कैसे समायेगा ? इसी तरह यदि उसे हाथीका शरीर मिले तो उसका माप हाथीके बराबर कैसे हो जायगा । इसके सिवा, मनुष्यका शरीर भी जन्मके समय बहुत छोटा- सा होता है, पीछे बहुत बड़ा हो जाता है तो आत्माका माप किस अवस्थाके शरीरके बराबर मानेंगे ? शरीरका हाथ या पैर आदि कोई अंग कट जानेसे आत्मा नहीं कट जाता । इस प्रकार विचार करनेसे आत्माको शरीरके बराबर माननेकी बात भी सर्वथा दोषपूर्ण प्रतीत होती है; अतः जैनमत भी अनुपपन्न होनेके कारण अमान्य है । सम्बन्ध-यदि जैनीलोग यह कहें कि 'आत्मा छोटे शरीरमें छोटा और बड़ेमें बड़ा हो जाता है, इसलिये हमारी मान्यतामें कोई दोष नहीं है' तो इसके उत्तरमें कहते हैं- न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ॥ २ । २ । ३५ ॥ च=इसके सिवा; पर्यायात्=आत्माको घटने-बढ़नेवाला मान लेनेसे; अपि=भी; अविरोधः=विरोधका निवारण; न=नहीं हो सकता; विकारादिभ्यः= क्योकि ऐसा माननेपर आत्मामें विकार आदि दोष प्राप्त होगे । व्याख्या-यदि यह मान लिया जाय कि आत्माको जब-जब जैसे मापवाला छोटा-बड़ा शरीर मिलता है, तब-तब वह भी वैसे ही मापवाला हो जाता है, तो भी आत्मा निर्दोष नहीं ठहरता; क्योकि ऐसा मान लेनेपर उसको विकारी, अवयवयुक्त, अनित्य तथा इसी प्रकार अन्य अनेक दोषोसे युक्त मानना हो जायगा । जो पदार्थ घटता-बढ़ता है, वह अवयवयुक्त होता है, किन्तु आत्मा अवयवयुक्त नहीं माना गया है। घटने-बढ़नेवाला पदार्थ नित्य नहीं हो सकता, परन्तु आत्माको नित्य माना गया है । घटना और बढ़ना विकार है, यह आत्मामे सम्भव नहीं है, क्योकि उसे निर्विकार माना गया है । इस प्रकार घटना-बढ़ना माननेसे अनेक दोष आत्मामे प्राप्त हो सकते हैं, अतः जैनियोंकी उपर्युक्त मान्यता युक्तिसङ्गत नहीं है ।