भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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१५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—जीवात्माको शरीरके वरावर मापवाला मानना सर्वथा असङ्गत है, इस बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं— अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषः ॥ २ । २ । ३६ ॥ च=और; अन्त्यावस्थितेः=अन्तिम अर्थात् मोक्षावस्थामे जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्य स्थिति स्वीकार की गयी है, इसलिये; उभयनित्य- त्वात्=आदि और मध्य-अवस्थामे जो उसका परिमाण ( माप ) रहा है, उसको भी नित्य मानना हो जाता है, अतः; अविशेषः=कोई विशेषता नहीं रह जाती ( सब शरीरोंमे उसका एक-सा माप सिद्ध हो जाता है )। व्याख्या—जैन-सिद्धान्तमें यह स्वीकार किया गया है कि मोक्षावस्थामे जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्य स्थिति है । वह घटता-बढ़ता नहीं है । इस कारण आदि और मध्यकी अवस्थामे भी जो उसका परिमाण है, उसको भी उसी प्रकार नित्य मानना हो जाता है; क्योकि पहलेका माप अनित्य मान लेनेपर अन्तिम मापको भी नित्य नहीं माना जा सकता । जो नित्य है, वह सदासे ही एक-सा रहता है । बीचमे घटता-बढ़ता नहीं है । इसलिये पहले या बीचकी अवस्थाओमे जितने शरीर उसे प्राप्त होते हैं, उन सबमें उसका छोटा या बड़ा एक-सा ही माप मानना पड़ेगा । किसी प्रकारकी विशेषताका मानना युक्तिसंगत नहीं होगा । इस प्रकार पूर्वापरकी मान्यतामे विरोध होनेके कारण आत्माको प्रत्येक शरीरके मापवाला मानना सर्वथा असंगत है । अतएव जैन-सिद्धान्त माननेके योग्य नहीं है । सम्बन्ध—इस प्रकार अनीश्वरवादियोंके मतका निराकरण करके अब पाशुपत सिद्धान्तवालोंकी मान्यतामें दोष दिखानेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— पत्युरसामञ्जस्यात् ॥ २ । २ । ३७ ॥ पत्युः=पशुपतिका मत भी आदरणीय नहीं है; असामञ्जस्यात्=क्योकि वह युक्तिविरुद्ध है । व्याख्या—पशुपति-मतको माननेवालोकी कल्पना वडी विचित्र है । इनके मतमे तत्त्वोंकी कल्पना वेदविरुद्ध है तथा मुक्तिके साधन भी ये लोग वेदविरुद्ध ही मानते हैं । उनका कथन है कि कण्ठी, रुचिका, कुण्डल, जटा, भस्म और यज्ञोपवीत—ये छः मुद्राएँ हैं, इनके द्वारा जो अपने शरीरको मुद्रित अर्थात् चिह्नित