भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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१६० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ नहीं है, जिससे कि इसे वेदविरोधी शास्त्र कहा जा सके। इस प्रसङ्गद्वारा भक्ति- शास्त्रकी महिमाका ही प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद्मे नारदजीके विषयमें भी ऐसा ही प्रसङ्ग आया है। नारदजीने सनत्कुमारजीसे कहा है, 'मैंने समस्त वेद, वेदाङ्ग, इतिहास, पुराण आदि पढ़ लिये तो भी मुझे आत्मतत्त्वका अनुभव नहीं हुआ।' यह कथन वेदादि शास्त्रोंको तुच्छ बतानेके लिये नहीं, आत्मज्ञानकी महत्ता सूचित करनेके लिये है। उसी प्रकार पाञ्चरात्रमें शाण्डिल्य- का प्रसङ्ग भी वेदोंकी तुच्छता बतानेके लिये नहीं, अपितु भक्तिशास्त्रकी महिमा प्रकट करनेके लिये आया है; अतः वह शास्त्र सर्वथा निर्दोष एवं वेदानुकूल है। दूसरा पाद सम्पूर्ण।