भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 417 में से

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तीसरा पाद सम्बन्ध—इस शास्त्रमें जो ब्रह्मके लक्षण बताये गये हैं, उनमें स्मृति और न्यायसे जो विरोध प्रतीत होता है, उसका निर्णयपूर्वक समाधान तो इस अध्याय- के पहले पादमें किया गया, उसके बाद दूसरे पादमें अपने सिद्धान्तकी सिद्धिके लिये अनीश्वरवादी नास्तिकोंके सिद्धान्तका तथा ईश्वरको मानते हुए भी उसको उपादान कारण न माननेवालोंके सिद्धान्तका युक्तियोंद्वारा निराकरण किया गया । साथ ही भागवतमतमे जो इस ग्रन्थके सिद्धान्तसे विरोध प्रतीत होता था, उसका समाधान करके उस पादकी समाप्ति की गयी । अब पूर्व प्रतिज्ञानुसार परब्रह्मको समस्त प्रपञ्चका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमें जो श्रुतियोंके वाक्योंसे विरोध प्रतीत होता है, उसका समाधान करनेके लिये तथा जीवात्माके स्वरूपका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद आरम्भ किया जाता है— श्रुतियोंमें कहीं तो कहा है कि परमेश्वरने पहले-पहल तेजकी रचना की, उसके बाद तेजसे जल और जलसे अन्न—इस क्रमसे जगत्की रचना हुई । कहीं कहा है कि पहले-पहल आकाशकी रचना हुई, उससे वायु आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति हुई । इस प्रकारके विकल्पोंकी एकता करके समाधान करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हैं— न वियदश्रुतेः ॥ २ । ३ । १ ॥ वियत्=आकाश; न=उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योकि ( छान्दोग्यो- पनिषद्के सृष्टि-प्रकरणमे ) उसकी उत्पत्ति नहीं सुनी गयी है । व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में जहाँ जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया है, वहाँ पहले-पहल तेजकी रचना बतायी गयी है ।* फिर तेज, जल और अन्न—इन तीनोंके सम्मेलनसे जगत्की रचनाका वर्णन है (छा० उ० ६ । २ । १ से ६ । ३ । ४ तक ), वहाँ आकाशकी उत्पत्तिका कोई प्रसङ्ग नहीं है तथा आकाशको विभु ( व्यापक ), माना गया है ( गीता १३ । ३२ ) । इसलिये यह सिद्ध होता है कि आकाश नित्य है, वह उत्पन्न नहीं होता ।

  • 'तत्तेजोऽसृजत ।' ( छा० उ० ६ । २ । ३ ) वे० द० ११—