ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—इस शङ्काके उत्तरमें कहते हैं— अस्ति तु ॥ २ । ३ । २ ॥ तु=किन्तु ( दूसरी श्रुतिमे ); अस्ति=आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन भी है। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्में 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है' इस प्रकार ब्रह्मके लक्षण बताकर फिर उसी ब्रह्मसे आकाशकी उत्पत्ति बतायी गयी है,* इसलिये यह कहना ठीक नहीं कि वेदमें आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं है। सम्बन्ध—उक्त विषयको स्पष्ट करनेके लिये पुनः पूर्वपक्षको उठाया जाता है— गौण्यसम्भवात् ॥ २ । ३ । ३ ॥ असम्भवात्=आकाशकी उत्पत्ति असम्भव होनेके कारण; गौणी=यह श्रुति गौणी है। व्याख्या—अवयवरहित और विभु होनेके कारण आकाशका उत्पन्न होना नहीं बन सकता, अतः तैत्तिरीयोपनिषद्मे जो आकाशकी उत्पत्ति बतायी है, उस कथनको गौण समझना चाहिये, वहाँ किसी दूसरे अभिप्रायसे आकाशकी उत्पत्ति कही गयी होगी। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे अपने पक्षको दृढ करनेके लिये दूसरा हेतु दिया जाता है— शब्दाच्च ॥ २ । ३ । ४ ॥ शब्दात्=शब्दप्रमाणसे; च=भी ( यह सिद्ध होता है कि आकाश उत्पन्न नहीं हो सकता )। व्याख्या—बृहदारण्यकमें कहा है कि 'वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम्'—'वायु और अन्तरिक्ष—यह अमृत है' ( बृह० उ० २ । ३ । ३ ), अतः जो अमृत हो, उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; तथा यह भी कहा है कि 'जिस प्रकार यह आकाश अनन्त है, उसी प्रकार आत्माको अनन्त समझना चाहिये।' 'आकाशशरीरं ब्रह्म' 'ब्रह्मका शरीर आकाश है' ( तै० उ० १ । ६ । २ ) इन
- तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । इत्यादि । ( तै० उ० २ । १ । १ )