ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २-६ ] अध्याय २ १६३ श्रुति-वाक्योंसे आकाशकी अनन्तता सिद्ध होती है, इसलिये भी आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त श्रुतिमे जिस प्रकार आकाश- की उत्पत्ति बतानेवाले वाक्य हैं, उसी प्रकार वायु, अग्नि आदिकी उत्पत्ति बतानेवाले शब्द भी हैं; फिर यह कैसे माना जा सकता है कि आकाशके लिये तो कहना गौण है और दूसरोंके लिये मुख्य है, इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे उत्तर दिया जाता है— स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॥ २ । ३ । ५ ॥ च=तथा; ब्रह्मशब्दवत्=ब्रह्मशब्दकी भाँति; एकस्य=किसी एक शब्दका प्रयोगः स्यात्=गौण भी हो सकता है। व्याख्या—दूसरी जगह एक ही प्रकरणमे पहले तो कहा है कि 'तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।'—'ब्रह्म विज्ञानमय तपसे वृद्धिको प्राप्त होता है, उससे अन्न उत्पन्न होता है।' (मु० उ० १ । १ । ८) उसके बाद कहा है कि— यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ (मु० उ० १ । १ । ९) अर्थात् 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उससे यह ब्रह्म और नाम, रूप एवं अन्न उत्पन्न होता है।' इस प्रकरणमें जैसे पहले ब्रह्म शब्द मुख्य अर्थमे प्रयुक्त हुआ है और पीछे उसी ब्रह्म शब्दका गौण अर्थमे प्रयोग किया गया है, उसी प्रकार श्रुतिमे किसी एक शब्द ( आकाश आदि ) का गौण अर्थमें प्रयोग भी हो सकता है । सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंद्वारा उसका समाधान करते हैं— प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥ २ । ३ । ६ ॥ अव्यतिरेकात्=ब्रह्मके कार्यसे आकाशको अलग न माननेसे ही; प्रतिज्ञाऽहानिः=एकके ज्ञानमे सबके ज्ञानसम्बन्धी प्रतिज्ञाकी रक्षा हो सकती है; शब्देभ्यः=श्रुतिके शब्दोंसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या—उपनिषदोंमे जो एकको जाननेसे सबका ज्ञान हो जानेकी प्रतिज्ञा की गयी है और उस प्रसङ्गमें जो कारण-कार्यके उदाहरण दिये गये हैं,