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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

१६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—इस शङ्काके उत्तरमें कहते हैं— अस्ति तु ॥ २ । ३ । २ ॥ तु=किन्तु ( दूसरी श्रुतिमे ); अस्ति=आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन भी है। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्में 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है' इस प्रकार ब्रह्मके लक्षण बताकर फिर उसी ब्रह्मसे आकाशकी उत्पत्ति बतायी गयी है,* इसलिये यह कहना ठीक नहीं कि वेदमें आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं है। सम्बन्ध—उक्त विषयको स्पष्ट करनेके लिये पुनः पूर्वपक्षको उठाया जाता है— गौण्यसम्भवात् ॥ २ । ३ । ३ ॥ असम्भवात्=आकाशकी उत्पत्ति असम्भव होनेके कारण; गौणी=यह श्रुति गौणी है। व्याख्या—अवयवरहित और विभु होनेके कारण आकाशका उत्पन्न होना नहीं बन सकता, अतः तैत्तिरीयोपनिषद्मे जो आकाशकी उत्पत्ति बतायी है, उस कथनको गौण समझना चाहिये, वहाँ किसी दूसरे अभिप्रायसे आकाशकी उत्पत्ति कही गयी होगी। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे अपने पक्षको दृढ करनेके लिये दूसरा हेतु दिया जाता है— शब्दाच्च ॥ २ । ३ । ४ ॥ शब्दात्=शब्दप्रमाणसे; च=भी ( यह सिद्ध होता है कि आकाश उत्पन्न नहीं हो सकता )। व्याख्या—बृहदारण्यकमें कहा है कि 'वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम्'—'वायु और अन्तरिक्ष—यह अमृत है' ( बृह० उ० २ । ३ । ३ ), अतः जो अमृत हो, उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; तथा यह भी कहा है कि 'जिस प्रकार यह आकाश अनन्त है, उसी प्रकार आत्माको अनन्त समझना चाहिये।' 'आकाशशरीरं ब्रह्म' 'ब्रह्मका शरीर आकाश है' ( तै० उ० १ । ६ । २ ) इन

  • तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । इत्यादि । ( तै० उ० २ । १ । १ )

सूत्र २-६ ] अध्याय २ १६३

सूत्र २-६ ] अध्याय २ १६३ श्रुति-वाक्योंसे आकाशकी अनन्तता सिद्ध होती है, इसलिये भी आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त श्रुतिमे जिस प्रकार आकाश- की उत्पत्ति बतानेवाले वाक्य हैं, उसी प्रकार वायु, अग्नि आदिकी उत्पत्ति बतानेवाले शब्द भी हैं; फिर यह कैसे माना जा सकता है कि आकाशके लिये तो कहना गौण है और दूसरोंके लिये मुख्य है, इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे उत्तर दिया जाता है— स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॥ २ । ३ । ५ ॥ च=तथा; ब्रह्मशब्दवत्=ब्रह्मशब्दकी भाँति; एकस्य=किसी एक शब्दका प्रयोगः स्यात्=गौण भी हो सकता है। व्याख्या—दूसरी जगह एक ही प्रकरणमे पहले तो कहा है कि 'तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।'—'ब्रह्म विज्ञानमय तपसे वृद्धिको प्राप्त होता है, उससे अन्न उत्पन्न होता है।' (मु० उ० १ । १ । ८) उसके बाद कहा है कि— यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ (मु० उ० १ । १ । ९) अर्थात् 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उससे यह ब्रह्म और नाम, रूप एवं अन्न उत्पन्न होता है।' इस प्रकरणमें जैसे पहले ब्रह्म शब्द मुख्य अर्थमे प्रयुक्त हुआ है और पीछे उसी ब्रह्म शब्दका गौण अर्थमे प्रयोग किया गया है, उसी प्रकार श्रुतिमे किसी एक शब्द ( आकाश आदि ) का गौण अर्थमें प्रयोग भी हो सकता है । सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंद्वारा उसका समाधान करते हैं— प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥ २ । ३ । ६ ॥ अव्यतिरेकात्=ब्रह्मके कार्यसे आकाशको अलग न माननेसे ही; प्रतिज्ञाऽहानिः=एकके ज्ञानमे सबके ज्ञानसम्बन्धी प्रतिज्ञाकी रक्षा हो सकती है; शब्देभ्यः=श्रुतिके शब्दोंसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या—उपनिषदोंमे जो एकको जाननेसे सबका ज्ञान हो जानेकी प्रतिज्ञा की गयी है और उस प्रसङ्गमें जो कारण-कार्यके उदाहरण दिये गये हैं,

१६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (छा० उ० ६ । १ । १ से ६ तक) उन सबकी विरोधरहित सिद्धि आकाशको ब्रह्मके कार्यसे अलग न माननेपर ही हो सकती है, अन्यथा नहीं; क्योंकि वहाँ मिट्टी और सुवर्ण आदिका दृष्टान्त देकर उनके किसी एक कार्यके ज्ञानसे कारणके ज्ञानद्वारा सबका ज्ञान होना बताया है । अतः यदि आकाशको ब्रह्मका कार्य न मानकर ब्रह्मसे अलग मानेंगे तो कारणरूप ब्रह्मको जान लेनेपर भी आकाश जाना हुआ नहीं होगा; इससे प्रतिज्ञाकी हानि होगी । इतना ही नहीं, 'यह सब ब्रह्म ही है' (मु० उ० २ । २ । ११) 'यह सब इस ब्रह्मका स्वरूप है' (छा० उ० ६ । ८ । ७) 'यह सब निःसन्देह ब्रह्म ही है; क्योंकि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय उसीमे होते हैं' (छा० उ० ३ । १४ । १) इत्यादि श्रुतिवाक्योसे भी यही सिद्ध होता है कि आकाश उस ब्रह्मका ही कार्य है । यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥ २ । ३ । ७ ॥ तु=तथा; लोकवत्=साधारण लौकिक व्यवहारकी भाँति; यावद्विकारम्= विकारमात्र सब कुछ; विभागः=ब्रह्मका ही विभाग (कार्य) है । व्याख्या-जिस प्रकार लोकमे यह बात देखी जाती है कि कोई पुरुष देवदत्तके पुत्रोका परिचय देते समय कहता है—'ये सब-के-सब देवदत्तके पुत्र हैं।' फिर वह उनमेसे किसी एक या दोका ही नाम लेकर यदि कहे कि 'इनकी उत्पत्ति देवदत्तसे हुई है' तो भी उन सबकी उत्पत्ति देवदत्तसे ही मानी जायगी, उसी प्रकार जब समस्त विकारात्मक जगत्‌को उस ब्रह्मका कार्य बता दिया गया, तब आकाश उससे अलग कैसे रह सकता है । अतः तेज आदिकी सृष्टि बताते समय यदि आकाशका नाम छूट गया तो भी यही सिद्ध होता है कि आकाश भी अन्य तत्त्वोंकी भाँति ब्रह्मका कार्य है और वह उससे उत्पन्न होता है । वायु और आकाशको अमृत कहनेका तात्पर्य देवताओंकी भाँति उन्हें अन्यकी अपेक्षा चिरस्थायी बतानामात्र है । सम्बन्ध—इस प्रकार आकाशका उत्पन्न होना सिद्ध करके उसीके उदाहरणसे यह निश्चय किया जाता है कि वायु भी उत्पन्न होता है— एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॥ २ । ३ । ८ ॥

सूत्र ७—१० ] अध्याय २ १६५

सूत्र ७—१० ] अध्याय २ १६५ एतेन=इससे अर्थात् आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध करनेवाले कथनसे ही; मातरिश्वा=वायुका उत्पन्न होना; व्याख्यातः=बता दिया गया । व्याख्या—जिन युक्तियो और श्रुतिप्रमाणोद्वारा पूर्वसूत्रोमे ब्रह्मसे आकाशका उत्पन्न होना निश्चित किया गया, उन्हींसे यह कहना भी हो गया कि वायु भी उत्पन्न होता है। अतः उसके विषयमे अलग कहना आवश्यक नहीं समझा गया। सम्बन्ध—इस प्रकार आकाश और वायुको उत्पत्तिशील बतलाकर अब इस दृश्य-जगत्में जिन तत्त्वोंको दूसरे मतवाले नित्य मानते हैं तथा जिनकी उत्पत्ति- का स्पष्ट वर्णन वेदमे नही आया है, उन सबको भी उत्पत्तिशील बतानेके लिये अगला सूत्र कहते हैं— असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॥ २ । ३ । ९ ॥ सतः='सत्' शब्दवाच्य ब्रह्मके सिवा (अन्य किसीका उत्पन्न न होना); तु=तो; असम्भवः = असम्भव है; अनुपपत्तेः=क्योकि 'अन्य किसीका उत्पन्न न होना युक्ति और प्रमाणद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। व्याख्या—जिस पूर्णब्रह्म परमात्माका श्रुतिमें जगह-जगह सत् नामसे वर्णन आया है तथा जो इस जड-चेतनात्मक जगत्का परम कारण माना गया है, उसे छोड़कर इस जगत्में कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो उत्पत्तिशील न हो। बुद्धि, अहङ्कार, काल तथा गुण और परमाणु आदि सभी उत्पत्तिशील है; क्योकि वेदमे प्रलयके समय एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न किसीका अस्तित्व स्वीकार नहीं किया गया है। इसलिये युक्ति या प्रमाणद्वारा कोई भी पदार्थ उत्पन्न न होनेवाला सिद्ध नहीं हो सकता। अतः ब्रह्मके सिवा सब कुछ उत्पत्तिशील है। सम्बन्ध—छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा है कि 'उस ब्रह्मने तेजको रचा' और तैत्तिरीयोपनिषद्में बताया गया है कि 'सर्वात्मा परमेश्वरसे आकाश उत्पन्न हुआ, आकाशसे वायु और वायुसे तेज।' अतः यहाँ तेजको किससे उत्पन्न हुआ माना जाय ? ब्रह्मसे या वायुसे ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तेजोऽतस्तथा ह्याह ॥ २ । ३ । १० ॥ तेजः = तेज; अतः = इस ( वायु ) से ( उत्पन्न हुआ ); तथा हि = ऐसा ही; आह=अन्यत्र कहा है।

१६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—तेज-तत्त्व वायुसे उत्पन्न हुआ, यही मानना चाहिये; क्योंकि यही बात श्रुतिमें दूसरी जगह कही गयी है। भाव यह है कि उस ब्रह्मने वायुसे तेज- की रचना की अर्थात् आकाश और वायुको पहले उत्पन्न करके उसके बाद वायुसे तेजकी उत्पत्ति की; ऐसा माननेपर दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता हो जायगी। सम्बन्ध—इसी प्रकार— आपः ॥ २ । ३ । ११ ॥ आपः = जल ( तेजसे उत्पन्न हुआ )। व्याख्या—उपर्युक्त प्रकारसे दोनों श्रुतियोंके कथनकी एकता होनेसे उक्त तेजसे जल उत्पन्न हुआ, यह समझना चाहिये। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें यह कहा गया है कि उस जलने अन्नको रचा, अतः यहाँ गेहूँ, जौ आदि अन्नकी उत्पत्ति जलसे हुई या पृथिवीसे ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ २ । ३ । १२ ॥ पृथिवी=( इस प्रकरणमें अन्नके नामसे ) पृथिवी ही कही गयी है; अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः=क्योंकि पाँचों तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है, उसमें बताया हुआ काला रूप भी पृथिवीका ही माना गया है तथा दूसरी श्रुतिमें भी जलसे पृथिवीकी ही उत्पत्ति बतायी गयी है। व्याख्या—इस प्रकरणमें अन्न शब्द पृथिवीका ही बोधक है, ऐसा समझना ठीक है; क्योंकि यह तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है तथा जो अन्नका रूप काला बताया गया है, वह भी अन्नका रूप नहीं है, पृथिवीका ही रूप काला माना गया है। इसके सिवा, तैत्तिरीयोपनिषद्मे जहाँ इस क्रमका वर्णन है, वहाँ भी जलसे पृथिवीका उत्पन्न होना बताया गया है, उसके बाद पृथिवीसे ओषधि और ओषधिसे अन्नकी उत्पत्तिका वर्णन है* । इसलिये यहाँ सीधे जलसे ही अन्नकी उत्पत्ति मानना ठीक नहीं है। छान्दोग्यके उक्त प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है कि 'यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवति ।' ( ६ । २ । ४ ) अर्थात् 'जहाँ-कहीं जल अधिक बरसता है, वहीं अन्नकी उत्पत्ति अधिक होती है।' इसका भी यही भाव है कि जलके सम्बन्धसे पृथिवीमें पहले ओषधि अर्थात्

  • देखिये पृष्ठ १६२ की टिप्पणी ।

सूत्र ११—१४] अध्याय २ १६७

सूत्र ११—१४] अध्याय २ १६७ अन्नका पौधा उत्पन्न होता है और उससे अन्न उत्पन्न होता है; ऐसा माननेपर पूर्वापरमें कोई विरोध नहीं रहेगा। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें आकाशकी उत्पत्ति साक्षात् ब्रह्मसे बतायी गयी है और अन्य चार तत्त्वोंमें एकसे दूसरेकी क्रमशः उत्पत्ति बतायी है। अतः यह जिज्ञासा होती है कि एक तत्त्वके बाद दूसरे तत्त्वकी रचना साक्षात् परमेश्वर करता है या एक तत्त्व दूसरे तत्त्वको स्वयं उत्पन्न करता है? इसपर कहते हैं— तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात्सः ॥ २ । ३ । १३ ॥ तदभिध्यानात् = उन तत्त्वोंके भलीभाँति चिन्तन करनेका कथन होनेसे; एव = ही; तु = तो (यह सिद्ध होता है कि); सः = वह परमात्मा ही उन सबकी रचना करता है; तल्लिङ्गात् = क्योंकि उक्त लक्षण उसीके अनुरूप है। व्याख्या—इस प्रकरणमें बार-बार कार्यके चिन्तनकी बात कही गयी है, यह चिन्तनरूप कर्म जड़में सम्भव नहीं है, चेतन परमात्मामें ही सङ्गत हो सकता है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा स्वयं ही उत्पन्न किये हुए पहले तत्त्वसे दूसरे तत्त्वको उत्पन्न करता है। इसी उद्देश्यसे एक तत्त्वसे दूसरे तत्त्वकी उत्पत्तिका कथन है। उन तत्त्वोंको स्वतन्त्र- रूपसे एक-दूसरेके कार्य-कारण बतानेके उद्देश्यसे नहीं। इसलिये यही समझना चाहिये कि मुख्यरूपसे सबकी रचना करनेवाला वह पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर ही है, अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध—इस प्रकार जगत्की उत्पत्तिके वर्णनद्वारा ब्रह्मको जगत्‌का कारण बताकर अब प्रलयके वर्णनसे भी इसी बातकी पुष्टि करते हैं— विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥ २ । ३ । १४ ॥ तु = किन्तु; अतः = इस उत्पत्ति-क्रमसे; क्रमः = प्रलयका क्रम; विपर्ययेण = विपरीत होता है; उपपद्यते = ऐसा ही होना युक्तिसङ्गत है; च = तथा (स्मृतिमें भी ऐसा ही वर्णन है)। व्याख्या—उपनिषदोंमें जगत्की उत्पत्तिका जो क्रम बताया गया है, इससे विपरीत क्रम प्रलयकालमें होता है। प्रारम्भिक सृष्टिके समय ब्रह्मने आकाश, वायु,

१६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ तेज, जल और पृथिवी आदिके क्रमसे जगत्‌की उत्पत्ति होती है। फिर जब प्रलय- काल आता है, तब ठीक उसके विपरीत क्रमसे पृथिवी आदि तत्त्वों- का अपने कारणोंमें लय होता है। जैसे पृथिवी जलमे, जल अग्निमें, अग्नि वायु- में, वायु आकाशमें और आकाश परमात्मामें विलीन हो जाता है। युक्तिसे भी यही क्रम ठीक जान पड़ता है। प्रत्येक कार्य अपने उपादान कारणमें ही लीन होता है। जैसे जलसे बर्फ बनता है और जलमें ही उसका लय होता है। स्मृतियोंमें भी ऐसा ही वर्णन आता है। (देखिये विष्णुपुराण अंश ६, अध्याय ४, श्लोक १४ से ३८ तक)। सम्बन्ध—यहाँ भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका क्रम तो बताया गया, परन्तु मन, बुद्धि और इन्द्रियोंकी उत्पत्तिके विषयमें कोई निर्णय नहीं हुआ; अतः यह जिज्ञासा होती है कि इन सबकी उत्पत्ति भूतोंसे होती है या परमेश्वरसे ? यदि परमेश्वरसे होती है तो भूतोंके पहले होती है या पीछे ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं— अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ॥ २ । ३ । १५ ॥ चेत्=यदि कहो; विज्ञानमनसी=इन्द्रियाँ और मन; क्रमेण=उत्पत्ति-क्रम- की दृष्टिसे; अन्तरा ( स्याताम् )=परमात्मा और आकाश आदि भूतोंके बीचमें होने चाहिये; तल्लिङ्गात्=क्योंकि ( श्रुतिमे ) यही निश्चय करानेवाला लिङ्ग (प्रमाण) प्राप्त होता है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अवि- शेषात्=क्योंकि श्रुतिमें किसी क्रम-विशेषका वर्णन नहीं है। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में पहले यह वर्णन आया है कि 'जैसे प्रज्वलित अग्निसे चिनगारियोंकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार ये नाना नाम-रूपोंसे संयुक्त पदार्थ उस परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं और उसीमे विलीन हो जाते हैं।'* (मु० २ । १ । १) फिर जगत्‌के कारणरूप उस परमेश्वरके परात्पर स्वरूप-

  • यथा सुदीप्तात् पावकाद् विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति ॥ (मु० उ० २ । १ । १)

सूत्र १५ ] अध्याय २ १६९

सूत्र १५ ] अध्याय २ १६९ का वर्णन करते हुए उसे अजन्मा, अविनाशी, दिव्य, निराकार, सब प्रकारसे परम शुद्ध और समस्त जगत्‌के बाहर-भीतर व्याप्त बताया गया है । * तदनन्तर यह कहा गया है कि 'इसी परब्रह्म पुरुषोत्तमसे यह प्राण, मन, सब इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, ज्योति, जल और सबको धारण करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है ।' † इस वर्णनसे परमात्मासे पहले प्राण, मन और इन्द्रियोंके उत्पन्न होनेकी बात बताकर आकाश आदि भूतोंकी क्रमशः उत्पत्ति बतायी गयी है; अतः परमात्मा और आकाशके बीचमें मन इन्द्रियोंका स्थान निश्चित होता है । तात्पर्य यह कि प्राण और इन्द्रियोसहित मनकी उत्पत्ति- के बाद ही आकाश आदि भूतोंकी सृष्टि माननी चाहिये; क्योंकि उपर्युक्त श्रुतिमे जैसा क्रम दिया गया है, वह इसी निश्चयपर पहुँचानेवाला है; ऐसा यदि कोई कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि इस वर्णनमें विशेषरूपसे कोई क्रम नहीं बताया गया है । इससे तो केवल यही बात सिद्ध होती है कि बुद्धि, मन और इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भी परमेश्वरसे ही होती है; इतना ही क्यों, उक्त श्रुतिके पूरे प्रकरणको देखनेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि श्रुतिका उद्देश्य किसी प्रकारके क्रमका प्रतिपादन करना नहीं है, उसे केवल यही बताना अभीष्ट है कि जगत्‌का उपादान और निमित्त कारण एकमात्र ब्रह्म है; क्योंकि भिन्न-भिन्न कल्पोंमे भिन्न-भिन्न क्रमसे जगत्‌की उत्पत्तिका वर्णन श्रुतियो और स्मृतियोंमें पाया जाता है । अतः किसी एक ही क्रमको निश्चित कर देना नहीं बन सकता ( देखिये मु० उ० २ । १ । ५ से ९ तक ) । सम्बन्ध—इस ग्रन्थमें अबतकके विवेचनसे परब्रह्म परमेश्वरको जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्‌का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया । इससे यह प्रतीत होता है कि उस परब्रह्मसे अन्य तत्त्वोंकी भाँति जीवोंकी भी उत्पत्ति होती है । यदि यही बात है तो फिर यह प्रश्न उठता है कि परमात्माका ही अंश होनेसे जीवात्मा तो अविनाशी, नित्य तथा जन्म-मरणसे रहित माना गया है, उसकी उत्पत्ति कैसे होती है ? इसपर कहते हैं—

  • दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥ ( मु० उ० २ । १ । २ ) † एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ( मु० उ० २ । १ । ३ )

१७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात्तद्व्यपदेशो भाक्तस्त- द्भावभावित्वात् ॥ २ । ३ । १६ ॥ तु=किन्तु; चराचरव्यपाश्रयः=चराचर शरीरोंको लेकर कहा हुआ; तद्व्यपदेशः=वह जन्म-मरण आदिका कथन; भाक्तः स्यात्=जीवात्माके लिये गौणरूपसे हो सकता है; तद्भावभावित्वात्=क्योकि वह उन-उन शरीरोके भावसे भावित रहता है । व्याख्या—यह जीवात्मा वास्तवमे सर्वथा शुद्ध परमेश्वरका अंश, जन्म-मरणसे रहित विज्ञानस्वरूप नित्य अविनाशी है; इसमें कोई शङ्का नहीं है । तो भी यह अनादि परम्परागत अपने कर्मोंके अनुसार मिले हुए स्थावर (वृक्ष-पहाड़ आदि), जङ्गम (देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) शरीरोंके आश्रित है, उन-उनके साथ तद्रूप हो रहा है, 'मैं शरीरसे सर्वथा भिन्न हूँ, इससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है,' इस वास्तविक तत्त्वको नहीं जानता, इस कारण उन-उन शरीरोंके जन्म-मरण आदिको लेकर गौणरूपसे जीवात्माका उत्पन्न होना श्रुतिमे कहा गया है, इसलिये कोई विरोध नहीं है । कल्पके आदिमें इस जड-चेतनात्मक अनादिसिद्ध जगत्का प्रकट हो जाना ही उस परमात्मामे इसका उत्पन्न होना है और कल्पके अन्तमे उस परमेश्वरमे विलीन हो जाना ही उसका लय है (गीता ९ । ७-१०) । इसके सिवा, परब्रह्म परमात्मा किन्हीं नये जीवोंको उत्पन्न करते हों, ऐसी बात नहीं है । इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन प्रकारके शरीरोंके आश्रित जीवात्माका परमात्मासे उत्पन्न होना और उसमें विलीन होना श्रुति-स्मृतियोंमें जगह-जगह कहा गया है । जीवोंको भगवान् उनके परम्परागत संचित कर्मोंके अनुसार ही अच्छी-बुरी योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, यह पहले सिद्ध कर दिया गया है (देखिये ब्र० सू० २ । १ । ३४) । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीवोंकी उत्पत्ति गौण न मानकर मुख्य मान ली जाय तो क्या आपत्ति है, इसपर कहते हैं— नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॥ २ । ३ । १७ ॥ आत्मा=जीवात्मा; न=वास्तवमें उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें कहीं भी जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं बतायी गयी है; च=इसके सिवा; ताभ्यः=उन

सूत्र १८—१८ ] अध्याय २ १७१

सूत्र १८—१८ ] अध्याय २ १७१ श्रुतियोंसे ही; नित्यत्वात् = इसकी नित्यता सिद्ध की गयी है, इसलिये भी ( जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती ) । व्याख्या—श्रुतिमें कहीं भी जीवात्माका वास्तवमें उत्पन्न होना नहीं कहा गया है। मुण्डकोपनिषद्में जो अग्निके दृष्टान्तसे नाना भावोंकी उत्पत्तिका वर्णन है—* ( मु० उ० २ । १ । १ ) वह पूर्वसूत्रमें कहे अनुसार शरीरोंकी उत्पत्ति- को लेकर ही है। इसी प्रकार दूसरी श्रुतियोंके कथनका उद्देश्य भी समझ लेना चाहिये । अतः श्रुतिका यही निश्चित सिद्धान्त है कि जीवात्माकी स्वरूपसे उत्पत्ति नहीं होती । इतना ही नहीं, श्रुतियोंद्वारा उसकी नित्यताका भी प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद्मे सजीव वृक्षके दृष्टान्तसे श्वेतकेतुको समझाते हुए उसके पिताने कहा है कि 'जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते ।' अर्थात् 'जीवसे रहित हुआ यह शरीर ही मरता है, जीवात्मा नहीं मरता' ( छा० उ० ६ । ११ । ३ ), कठोपनिषद्मे कहा है कि 'यह विज्ञानस्वरूप जीवात्मा न तो जन्मता है और न मरता ही है। यह अजन्मा, नित्य, सदा रहनेवाला और पुराण है, शरीरका नाश होनेपर इसका नाश नहीं होता'† ( क०उ० १ । २ । १८ ) इत्यादि । इसलिये यह सर्वथा निर्विवाद है कि जीवात्मा स्वरूपसे उत्पन्न नहीं होता । सम्बन्ध—जीवकी नित्यताको दृढ़ करनेके लिये पुनः कहते हैं— ज्ञोऽत एव ॥ २ । ३ । १८ ॥ अतः=( वह नित्यचैतन्यरूप है ) इसलिये; एव=ही; ज्ञः=ज्ञाता है। व्याख्या—वह जीवात्मा स्वरूपसे जन्मने-मरनेवाला नहीं है, नित्य चेतन है, इसी- लिये वह ज्ञाता है। भाव यह कि वह जन्मने-मरनेवाला या घटने-बढ़नेवाला और अनित्य होता तो ज्ञाता नहीं हो सकता । किन्तु सिद्ध योगी अपने जन्म-जन्मान्तरोंकी बात जान लेता है तथा प्रत्येक जीवात्मा पहले शरीरसे सम्बन्ध छोड़कर जब दूसरे नवीन शरीरको धारण करता है, तब पूर्वस्मृतिके अनुसार स्तन-पानादिमे प्रवृत्त हो जाता है। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदिको भी प्रजोत्पादनका ज्ञान पहलेके अनुभवकी स्मृतिसे हो जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि जीव नित्य है और ज्ञानस्वरूप है. शरीरोके बदलनेमे जीवात्मा नहीं बदलता । सम्बन्ध—जीवात्मा नित्य है, शरीरके बदलनेसे वह नहीं बदलता, इस बातको प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं—

  • यह मन्त्र पृष्ठ १६८ की टिप्पणीमे आ गया है। † न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

१७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ॥ २ । ३ । १९ ॥ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् = (एक ही जीवात्माके) शरीरसे उत्क्रमण करने, परलोकमें जाने और पुनः लौटकर आनेका श्रुतिमें वर्णन है (इससे भी यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा नित्य है)। व्याख्या—कठोपनिषद् (२ । २ । ७) में कहा है कि— योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ 'मरनेके बाद इन जीवात्माओंमेंसे अपने-अपने कर्मोंके अनुसार कोई तो वृक्षादि अचल शरीरको धारण कर लेते हैं और कोई देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जङ्गम शरीरोंको धारण कर लेते हैं।' प्रश्नोपनिषद्‌मे कहा है—'अथ यदि द्विमात्रेण मनसि संपद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते स सोमलोकं स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते।' (प्र० उ० ५ । ४)। अर्थात् 'जो इस ॐकारकी दो मात्राओका ध्यान करता है, वह मनोमय चन्द्रलोकको प्राप्त होता है। यजुर्वेदकी श्रुतियाँ उसे अन्तरिक्षवर्ती चन्द्रलोकमे ऊपरकी ओर ले जाती हैं; वहाँ स्वर्गलोकमे नाना प्रकारके ऐश्वर्योंका भोग करके वह पुनः मृत्युलोकमे लौट आता है।' इसी प्रकार अन्यान्य श्रुतियोंमें जीवात्माके वर्तमान शरीरको छोड़ने, परलोकमें जाने तथा वहाँसे पुनः लौटकर आनेका वर्णन है; इससे भी यही सिद्ध होता है कि शरीरके नाशसे जीवात्माका नाश नहीं होता, वह नित्य और अपरिवर्तनशील है। सम्बन्ध—कही हुई बातसे ही पुनः आत्माका नित्यत्व सिद्ध करते हैं— स्वात्मना चोत्तरयोः ॥ २ । ३ । २० ॥ उत्तरयोः=परलोकमे जाना और पुनः वहाँसे लौट आना—इन पीछे कही हुई दोनो क्रियाओंकी सिद्धि; स्वात्मना=स्वस्वरूपसे; च=ही होती है (इसलिये भी आत्मा नित्य है)। व्याख्या—उत्क्रान्तिका अर्थ है शरीरका वियोग। यह तो आत्माको नित्य न माननेपर भी होगा ही; किन्तु बादमें बतायी हुई गति और आगति अर्थात् परलोकमें जाना और वहाँसे लौटकर आना—इन दो क्रियाओंकी सिद्धि अपने

सूत्र १९—२२ ] अध्याय २ १७३

सूत्र १९—२२ ] अध्याय २ १७३ 'स्वरूपसे ही हो सकती है। जो परलोकमें जाता है, वही स्वयं लौटकर आता है, दूसरा नहीं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शरीरके नाशसे आत्माका नाश नहीं होता और वह सदा ही रहता है। सम्बन्ध—इस प्रकार श्रुतिप्रमाणसे जो आत्माका नित्यत्व सिद्ध किया गया, इसमें जीवात्माको गमनागमनशील—एक देशसे दूसरे देशमें जाने-आनेवाला कहा गया। यदि यही ठीक है तब तो आत्मा विभु नहीं माना जा सकता, उसको एकदेशी मानना पड़ेगा; अतः उसका नित्यत्व भी गौण ही होगा। इस शङ्काका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। इसमें पूर्वपक्षकी ओरसे आत्माके अणुत्वकी स्थापना करके अन्तमें उसको विभु (व्यापक) सिद्ध किया गया है— नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधिकारात् ॥ २ । ३ । २१ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अणुः=जीवात्मा अणु; न=नहीं है; अतच्छ्रुतेः= क्योंकि श्रुतिमें उसको अणु न कहकर महान् और व्यापक बताया गया है; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं; इतराधिकारात्=क्योंकि (जहाँ श्रुतियोंमें आत्माको महान् और विभु बताया है) वहाँ इतर अर्थात् परमात्माका प्रकरण है। व्याख्या—'स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ।' (बृह० उ० ४ । ४ । २२) अर्थात् 'जो यह विज्ञानमय आत्मा प्राणोंमें है, वही यह महान् अजन्मा आत्मा है।' इत्यादि श्रुतियोंके वर्णनको लेकर यदि यह कहा जाय कि श्रुतिमें उसको अणु नहीं कहा गया है, महान् कहा गया है, इसलिये जीवात्मा अणु नहीं है, व्यापक है तो यह सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि यह श्रुति परमात्माके प्रकरणकी है; अतः वहाँ आया हुआ 'आत्मा' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है। सम्बन्ध—केवल इतनी ही बात नहीं है, अपि तु— स्वशब्दानुमानाभ्यां च ॥ २ । ३ । २२ ॥ स्वशब्दानुमानाभ्याम्=श्रुतिमें अणुवाचक शब्द है, उससे और अनुमान (उपमा) वाचक दूसरे शब्दोंसे; च=भी (जीवात्माका अणुत्व सिद्ध होता है)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में कहा है कि 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः।'

१७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (३ । १ । ९) अर्थात् 'यह अणु परिमाणवाला आत्मा चित्तसे जाननेके योग्य है।' तथा श्वेताश्वतरमें कहा है कि 'वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः।' (५ । ९) अर्थात् 'बालके अग्रभागके सौ टुकड़े किये जायें और उनमेंसे एक टुकड़ेके पुनः एक सौ टुकड़े किये जायँ, तो उतना ही माप जीवात्माका समझना चाहिये।' इस प्रकार श्रुतिमे स्पष्ट शब्दोंमें जीवको 'अणु' कहा गया है तथा उपमासे भी उसका अणुके तुल्य माप बताया गया है एवं युक्तिसे भी यही समझमे आता है कि जीवात्मा अणु है; अन्यथा वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म शरीरमें प्रविष्ट कैसे हो सकता ? अतः यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा अणु है। सम्बन्ध—जीवात्माको शरीरके एक देशमें स्थित मान लेनेसे उसको समस्त शरीरमें होनेवाले सुख-दुःखादिका अनुभव कैसे होगा ? इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे कहा जाता है— अविरोधश्चन्दनवत् ॥ २ । ३ । २३ ॥ चन्दनवत् = जिस प्रकार एक देशमे लगाया हुआ चन्दन अपने गन्धरूप गुणसे सब जगह फैल जाता है, वैसे ही एक देशमे स्थित आत्मा विज्ञानरूप गुण- द्वारा समस्त शरीरको व्याप्त करके सुख-दुःखादिका ज्ञाता हो जाता हैं, अतः; अविरोधः = कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—जीवको अणु मान लेनेपर उसको शरीरके प्रत्येक देशमे होनेवाली पीड़ाका ज्ञान होना युक्तिविरुद्ध प्रतीत होता है, ऐसी शङ्का भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि जिस प्रकार किसी एक देशमें लगाया हुआ या मकानमे किसी एक जगह रक्खा हुआ चन्दन अपने गन्धरूप गुणसे सब जगह फैल जाता है, वैसे ही शरीरके भीतर एक जगह हृदयमें स्थित हुआ जीवात्मा अपने विज्ञानरूप गुणके द्वारा समस्त शरीरमे फैल जाता है और सभी अङ्गोंमें होनेवाले सुख- दुःखोंको जान सकता है। सम्बन्ध—शरीरके एक देशमें आत्माकी स्थिति है—यह सिद्ध करनेके लिये पूर्वपक्षी कहता है— अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाध्युपगमाद्धृदि हि ॥ २ । ३ । २४ ॥

सूत्र २३—२६ ] अध्याय २ १७५

सूत्र २३—२६ ] अध्याय २ १७५ चेत्=यदि कहो; अवस्थितिवैशेष्यात्=चन्दन और आत्माकी स्थितिमें भेद है, इसलिये ( चन्दनका दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है ); इति न=तो यह बात नहीं है; हि=क्योंकि; हृदि=हृदय-देशमे; अध्युपगमात्=उसकी स्थिति स्वीकार की गयी है। व्याख्या—यदि कहो कि चन्दनकी स्थिति तो एक देशमे प्रत्यक्ष है; किन्तु उसके समान आत्माकी स्थिति शरीरके एक देशमे प्रत्यक्ष नहीं है, इसलिये यह दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है। तो यह कहना ठीक नहीं; क्योकि श्रुतिने आत्माको हृदयमें स्थित बताकर उसकी एक देशमे स्थिति स्पष्ट स्वीकार की है। जैसे 'हृद्येष आत्मा' 'यह आत्मा हृदयमे स्थित है।' ( प्र० उ० ३ । ६ ) तथा 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमय प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः'—'आत्मा कौन है,' ऐसा पूछनेपर कहा है कि 'प्राणोंमें हृदयके अन्दर जो यह विज्ञानमय ज्योति स्वरूप पुरुष है।' ( बृह० उ० ४ । ३ । ७ ) इत्यादि । सम्बन्ध—उसी बातको प्रकारान्तरसे कहते हैं— गुणाद्वा लोकवत् ॥ २ । ३ । २५ ॥ वा=अथवा यह समझो कि अणुपरिमाणवाले जीवात्माका; गुणात्= चेतनतारूप गुणसे समस्त शरीरको चेतनायुक्त कर देना सम्भव है; लोकवत्=क्योकि लोकमे ऐसा देखा जाता है। व्याख्या—अथवा जिस प्रकार लोकमे यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है कि घरके किसी एक देशमें रक्खा हुआ दीपक अपने प्रकाशरूप गुणसे समस्त घरको प्रकाशित कर देता है, वैसे ही शरीरके एक देशमे स्थित अणु मापवाला जीवात्मा अपने चेतनतारूप गुणके द्वारा समस्त शरीरको चेतनायुक्त कर देता है; अतः इसमें कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध—गुण अपने गुणीसे अलग कैसे होता है ? इसपर कहते हैं— व्यतिरेको गन्धवत् ॥ २ । ३ । २६ ॥ गन्धवत्=गन्धकी भाँति; व्यतिरेकः=गुणका गुणीसे अलग होना बन सकता है (अतः कोई विरोध नहीं है)। व्याख्या—यहाँ यह शङ्का भी नहीं करनी चाहिये कि गुण तो गुणीके साथ

१७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ही रहता है, वह गुणीसे अलग होकर कोई कार्य कैसे कर सकता है; क्योंकि जैसे गन्ध अपने गुणी पुष्प आदिसे अलग होकर स्थानान्तरमे फैल जाती है, उसी प्रकार आत्माका चेतनतारूप गुण भी आत्मासे अलग होकर समस्त शरीरमें व्याप्त हो जाता है; अतः कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध—इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं— तथा च दर्शयति ॥ २ । ३ । २७ ॥ तथा=ऐसा; च=ही; दर्शयति=श्रुति भी दिखलाती है । व्याख्या—केवल युक्तिसे ही यह बात सिद्ध होती हो, ऐसा नहीं; श्रुतिमे भी आत्माका एक जगह रहकर अपने गुणके द्वारा समस्त शरीरमे नखसे लोमतक व्याप्त होना दिखाया गया है (बृह० उ० १ । ४ । ७), (छा० उ० ८ । ८ । १); अतः यह सिद्ध होता है कि आत्मा अणु है । सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्वपक्षीद्वारा इक्कीसवें सूत्रसे लेकर सत्ताईसवें सूत्रतक जीवात्माका अणु होना सिद्ध किया गया; किन्तु उसमें दी हुई युक्तियाँ सर्वथा निर्बल हैं और पूर्वपक्षीद्वारा उद्धृत श्रुति-प्रमाण तो आभासमात्र है ही, इसलिये अब सिद्धान्तीकी ओरसे अणुवादका खण्डन करके आत्माके विभुत्वकी सिद्धि की जाती है— पृथगुपदेशात् ॥ २ । ३ । २८ ॥ पृथक्=( जीवात्माके विषयमे ) अणुपरिमाणसे भिन्न; उपदेशात्=उपदेश श्रुतिमें मिलता है, इसलिये ( जीवात्मा अणु नहीं, विभु है ) । व्याख्या—पूर्वपक्षकी ओरसे जीवात्माको अणु बतानेके लिये जो प्रमाण दिया गया, उसी श्रुतिमें स्पष्ट शब्दोमे जीवात्माको विभु बताया गया है । भाव यह कि जहाँ जीवात्माका स्वरूप बालाग्रके दस हजारवें भागके समान बताया है, वहीं उसको 'स चानन्त्याय कल्पते ।' इस वाक्यसे अनन्त अर्थात् विभु होनेमे समर्थ कहा गया है ( श्वेता० उ० ५ । ९) । अतः प्रमाण देनेवालेको श्रुतिके अगले उपदेशपर भी दृष्टिपात करना चाहिये । इसके सिवा, कठोपनिषद् ( १ । ३ । १०, १३; २ । ३ । ७ ) मे स्पष्ट ही जीवात्माका विशेषण 'महान्' आया है तथा गीतामें भी जीवात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा है कि 'यह

सूत्र २९ ] अध्याय २ १७७

सूत्र २९ ] अध्याय २ १७७ आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।' (गीता २ । २४), 'जिस प्रकार सब जगह व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी शरीरमें सब जगह स्थित है तो भी उससे लिप्त नहीं होता।' (गीता १३ । ३२) तथा 'उस आत्माको तू अविनाशी समझ, जिससे यह समस्त जडसमुदाय व्याप्त है।' (गीता २ । १७)—इन प्रमाणोंके विषयमे यह नहीं कहा जा सकता कि ये परमात्माके प्रकरणमे आये हैं। सम्बन्ध—इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यदि ऐसी बात है तो श्रुतिमें जो स्पष्ट शब्दोंमें आत्माको अणु और अङ्गुष्ठमात्र कहा है, उसकी सङ्गति कैसे होगी ? इसपर कहते हैं— तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २ । ३ । २९ ॥ तद्व्यपदेशः=वह कथन; तु=तो; तद्गुणसारत्वात्=उस बुद्धि आदिके गुणोंकी प्रधानताको लेकर है; प्राज्ञवत्=जैसे परमेश्वरको अणु और हृदयमें स्थित अङ्गुष्ठमात्र बताया है, वैसे ही जीवात्माके लिये भी समझना चाहिये। व्याख्या—श्रुतिमे जीवात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला कहते हुए इस प्रकार वर्णन किया गया है— अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः सङ्कल्पाहङ्कारसमन्वितो यः। बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः ॥ 'जो अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला, सूर्यके सदृश प्रकाशस्वरूप तथा सङ्कल्प और अहङ्कारसे युक्त है, वह बुद्धिके गुणोंसे और शरीरके गुणोंसे ही आरेकी नोक-जैसे सूक्ष्म आकारवाला है—ऐसा परमात्मासे भिन्न जीवात्मा भी निस्सन्देह ज्ञानियोंद्वारा देखा गया है।' (श्वेता० उ० ५ । ८) जीवात्माकी गति- आगतिका वर्णन भी शरीरादिके सम्बन्धसे ही है (कौ० उ० ३ । ६; प्र० उ० ३ । ९, १०) *। इससे यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि श्रुतिमें जहाँ कहीं जीवात्माको एकदेशी 'अङ्गुष्ठमात्र' या 'अणु' कहा गया है, वह बुद्धि और शरीर- के गुणोंको लेकर ही है; जैसे परमात्माको भी जगह-जगह जीवात्माके हृदयमें स्थित (क० उ० १ । ३ । १; प्र० उ० ६ । २; मु० उ० २ । १ । १० तथा २ । २ । १; ३ । १ । ५; ७; श्वेता० उ० ३ । २०) तथा अङ्गुष्ठमात्र भी (क० उ० २ । १ । १२-१३) बताया है। वह कथन स्थानकी अपेक्षासे ही है, उसी प्रकार

  • यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति । वे० द० १२—

१७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ जीवात्माके विषयमे भी समझना चाहिये। वास्तवमें वह अणु नहीं, विभु है; इसमें कोई शङ्का नहीं है। पूर्वपक्षीने जो छान्दोग्य-श्रुतिका प्रमाण देकर यह बात कही कि 'वह एक जगह स्थित रहते हुए ही नखसे लोमतक व्याप्त है', वह कहना सर्वथा प्रकरण- विरुद्ध है; क्योंकि उस प्रकरणमें आत्माके गुणकी व्याप्तिविषयक कोई बात ही नहीं कही गयी है। तथा गन्ध, प्रदीप आदिका दृष्टान्त देकर जो गुणके द्वारा आत्माके चैतन्यकी व्याप्ति बतायी है, वह भी युक्तिसङ्गत नहीं है; क्योंकि श्रुतिमे आत्माको चैतन्यगुणविशिष्ट नहीं माना गया है, बल्कि परमेश्वरकी भाँति सत्, चेतन और आनन्द—ये उसके स्वरूपभूत लक्षण माने गये हैं। अतः जीवात्माको अणु मानना किसी प्रकार भी उचित नहीं है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि इस प्रकार बुद्धि आदिके गुणोंके संयोगसे आत्माको अङ्गुष्ठमात्र तथा एकदेशी माना जायगा, स्वरूपसे नहीं, तब तो जब प्रलयकालमें आत्माके साथ बुद्धि आदिका सम्बन्ध नहीं रहेगा, उस समय समस्त जीवोंकी मुक्ति हो जायगी। अतः प्रलयके बाद सृष्टि भी नहीं हो सकेगी। यदि मुक्त जीवोंका पुनः उत्पन्न होना मान लिया जाय तो मुक्तिके अभावका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, इसपर कहते हैं— यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॥ २ । ३ । ३० ॥ यावदात्मभावित्वात् = जबतक स्थूल, सूक्ष्म या कारण—इनमेंसे किसी भी शरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह उस शरीरके अनुरूप, एकदेशी-सा रहता है, इसलिये; च=भी; दोषः=उक्त दोष; न=नहीं है; तद्दर्शनात् = श्रुतिमे भी ऐसा ही देखा गया है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि जीवका एक शरीरसे दूसरेमे जाते समय भी सूक्ष्म शरीरसे सम्बन्ध बना रहता है (प्र० उ० ३ । ९, १०)। परलोकमें भी उसका शरीरसे सम्बन्ध माना गया है तथा सुषुप्ति और स्वप्नकालमें भी देहके साथ उसका सम्बन्ध बताया गया है (प्र० उ० ४ । २, ५)। * इसी प्रकार प्रलयकालमें भी

  • तस्मै स होवाच । यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजो- मण्डल एकीभवन्ति ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकी- भवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ।'

सूत्र ३०-३१ ] अध्याय २ १७९

सूत्र ३०-३१ ] अध्याय २ १७९ कर्मसंस्कारोंके सहित कारणशरीरसे जीवात्माका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि श्रुतिमें यह बात स्पष्ट कही है कि प्रलयकालमें यह विज्ञानात्मा समस्त इन्द्रियोंके सहित उस परब्रह्ममें स्थित होता है ( प्र० उ० ४ । ११ ), * इसलिये सुषुप्ति और प्रलयकाल- में समस्त जीवोंके मुक्त होनेका तथा मुक्त पुरुषोंके पुनर्जन्म आदिका कोई दोष नहीं आ सकता । सम्बन्ध-प्रलयकालमें तो समस्त जगत् परमात्मामें विलीन हो जाता है, वहाँ बुद्धि आदि तत्त्वोंकी भी परमात्मासे भिन्न सत्ता नहीं रहती, इस स्थितिमें बुद्धि आदिके समुदायरूप सूक्ष्म या कारण-शरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध कैसे रह सकता है ? और यदि उस समय नहीं रहता है तो सृष्टिकालमें कैसे सम्बन्ध हो जाता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात् ॥ २ । ३ । ३१ ॥ पुंस्त्वादिवत्=पुरुषत्व आदिकी भाँति; सतः=पहलेसे विद्यमान; अस्य= 'उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने कहा—गार्ग्य ! जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्यकी सब किरणें इस तेजोमण्डलमें एक हो जाती हैं; फिर उदय होनेपर वे सब पुनः-पुनः सब ओर फैलती रहती हैं। ठीक ऐसे ही (निद्राके समय) वे सब इन्द्रियाँ भी परमदेव मनमें एक हो जाती हैं; इस कारण उस समय यह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न मैथुनका आनन्द भोगता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है और न चलता ही है। उस समय 'वह सो रहा है' ऐसा लोग कहते हैं।' अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनु शृणोति । देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति । दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्व सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति । 'इस स्वप्नावस्थामें यह जीवात्मा अपनी विभूतिका अनुभव करता है; जो बार-बार देखा हुआ है, उसीको बार-बार देखता है। बार-बार सुनी हुई बातको पुनः-पुनः सुनता है। नाना देश और दिशाओंमें बार बार अनुभव किये हुए विषयोंको पुनः-पुनः अनुभव करता है। इतना ही नहीं, देखे और न देखे हुएको भी, सुने हुए और न सुने हुएको भी, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी तथा विद्यमान और अविद्यमान- को भी देखता है; इस प्रकार वह सारी घटनाओंको देखता है और सब कुछ स्वयं बनकर देखता है।'

  • विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥

१८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ शरीरादि सम्बन्धका; तु=ही; अभिव्यक्तियोगात्=सृष्टिकाळमें प्रकट होनेका योग है, इसलिये ( कोई दोष. नहीं है ) । व्याख्या-प्रलयकाळमें यद्यपि बुद्धि आदि तत्त्व स्थूलरूपमे न रहकर अपने कारणरूप परंब्रह्म परमेश्वरमें विलीन हो जाते हैं, तथापि भगवान्‌की अचिन्त्य शक्तिके रूपमें वे अव्यक्तरूपसे सब-के-सब विद्यमान रहते हैं । तथा सब जीवात्मा भी अपने-अपने कर्मसंस्काररूप कारण-शरीरोंके सहित अव्यक्तरूपसे उस परब्रह्म परमेश्वरमे विलीन रहते हैं ( प्र० उ० ४ । ११ ) ।* उनका सर्वथा नाश नहीं होता । अतः सृष्टिकालमें उस परब्रह्म परमात्माके संकल्पसे वे उसी प्रकार सूक्ष्म और स्थूल रूपोंमें प्रकट हो जाते हैं; जैसे बीजरूपमे पहलेसे ही विद्यमान पुरुषत्व बाल्यकालमें प्रकट नहीं होता, किन्तु युवावस्थामें शक्तिके संयोगसे प्रकट हो जाता है । यही बात बीज-वृक्षके सम्बन्धमे भी समझी जा सकती है । ( गीता अध्याय १४ श्लोक ३ और ४ में यही बात स्पष्ट की गयी है ) इसलिये कोई विरोध नहीं है । जिस साधकका अन्तःकरण साधनाके द्वारा जितना शुद्ध और व्यापक होता है, वह उतना ही विशाल हो जाता है । यही कारण है कि योगीमें दूर देशकी बात जानने आदिकी सामर्थ्य आ जाती है; क्योकि जीवात्मा तो पहलेसे सर्वत्र व्याप्त है ही, अन्तःकरण और स्थूल शरीरके सम्बन्धसे ही वह उसके अनुरूप आकारवाला हो रहा है । सम्बन्ध-जीवात्मा तो स्वयंप्रकाशस्वरूप है, उसे मन, बुद्धिके सम्बन्धसे वस्तुका ज्ञान होता है, यह माननेकी क्या आवश्यकता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वान्यथा ॥ २ । ३ । ३२ ॥ अन्यथा=जीवको अन्तःकरणके सम्बन्धसे विषय-ज्ञान होता है, ऐसा न माननेपर; नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गः=उसे सदा ही विषयोंके अनुभव होनेका या कभी भी न होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; वा=अथवा; अन्यतरनियमः= आत्माकी ग्राहकता-शक्ति या विषयकी ग्राह्यता-शक्तिके नियमन ( प्रतिबन्ध ) की ॐ यह मन्त्र पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें आ गया है ।

सूत्र ३२] अध्याय २ १८१

सूत्र ३२] अध्याय २ १८१ कल्पना करनी पड़ेगी (ऐसी दशामें अन्तःकरणका सम्बन्ध मानना ही युक्ति- सङ्गत है)। व्याख्या-यदि यह नहीं माना जाय कि यह जीवात्मा अन्तःकरणके सम्बन्ध- से समस्त वस्तुओका अनुभव करता है तो प्रत्यक्षमे जो यह देखा जाता है कि यह जीवात्मा कभी किसी वस्तुका अनुभव करता है और कभी नहीं करता, इसकी सिद्धि नहीं होगी; क्योकि इसको यदि प्रकाशस्वरूप होनेके कारण स्वतः अनुभव करनेवाला मानेंगे, तब तो इसे सदैव एक साथ प्रत्येक वस्तुका ज्ञान रहता है, ऐसा मानना पड़ेगा। यदि इसमे जाननेकी शक्ति स्वाभाविक नहीं मानेगे तो कभी नहीं जाननेका प्रसङ्ग आ जायगा। अथवा दोनोंमेंसे किसी एककी शक्तिका नियमन (सङ्कोच) मानना पड़ेगा। अर्थात् या तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि किसी निमित्तसे जीवात्माकी ग्राहकशक्तिका प्रतिबन्ध होता है या यह मानना पड़ेगा कि विषयकी ग्राह्यता-शक्तिमें किसी कारणवश प्रतिबन्ध आ जाता है। प्रतिबन्ध हट जानेपर विषयकी उपलब्धि होती है और उसके रहनेपर विषयो- पलब्धि नहीं होती। परन्तु यह गौरवपूर्ण कल्पना करनेकी अपेक्षा अन्तःकरणके सम्बन्धको स्वीकार कर लेनेमें ही लाघव है। इसलिये यही मानना ठीक है कि अन्तःकरणके सम्बन्धसे ही जीवात्माको समस्त लौकिक पदार्थोंका अनुभव होता है। 'मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति' (बृह० उ० १ । ५ । ३) अर्थात् 'मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है' इत्यादि मन्त्र-वाक्योंद्वारा श्रुति भी अन्तः- करणके सम्बन्धको स्वीकार करती है। जीवात्माका अन्तःकरणसे सम्बन्ध रहते हुए भी वह कभी तो कार्यरूपमें प्रकट रहता है और कभी कारणरूपसे अप्रकट रहता है। इस प्रकार यहाँतक यह बात सिद्ध हो गयी कि जीवात्माको जो अणु कहा गया है, वह उसकी सूक्ष्मताका बोधक है, न कि एकदेशिता (छोटेपन) का; और उसको जो अङ्गुष्ठमात्र कहा गया है, वह मनुष्य-शरीरके हृदयके मापके अनुसार कहा गया है तथा उसे जो छोटे आकारवाला बताया गया है, वह भी सङ्कीर्ण अन्तःकरणके सम्बन्धसे है, वास्तवमें वह विभु (समस्त जड पदार्थोंमें व्याप्त) और अनन्त (देश-कालकी सीमासे अतीत) है। सम्बन्ध-सांख्यमतमें जड प्रकृतिको स्वतन्त्र कर्ता माना गया है और पुरुषको असङ्ग माना गया है; किन्तु जड प्रकृतिको स्वभावसे कर्ता मानना युक्ति- सङ्गत नहीं है तथा पुरुष असङ्ग होनेसे उसको भी कर्ता मानना नहीं बन