ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १८—१८ ] अध्याय २ १७१ श्रुतियोंसे ही; नित्यत्वात् = इसकी नित्यता सिद्ध की गयी है, इसलिये भी ( जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती ) । व्याख्या—श्रुतिमें कहीं भी जीवात्माका वास्तवमें उत्पन्न होना नहीं कहा गया है। मुण्डकोपनिषद्में जो अग्निके दृष्टान्तसे नाना भावोंकी उत्पत्तिका वर्णन है—* ( मु० उ० २ । १ । १ ) वह पूर्वसूत्रमें कहे अनुसार शरीरोंकी उत्पत्ति- को लेकर ही है। इसी प्रकार दूसरी श्रुतियोंके कथनका उद्देश्य भी समझ लेना चाहिये । अतः श्रुतिका यही निश्चित सिद्धान्त है कि जीवात्माकी स्वरूपसे उत्पत्ति नहीं होती । इतना ही नहीं, श्रुतियोंद्वारा उसकी नित्यताका भी प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद्मे सजीव वृक्षके दृष्टान्तसे श्वेतकेतुको समझाते हुए उसके पिताने कहा है कि 'जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते ।' अर्थात् 'जीवसे रहित हुआ यह शरीर ही मरता है, जीवात्मा नहीं मरता' ( छा० उ० ६ । ११ । ३ ), कठोपनिषद्मे कहा है कि 'यह विज्ञानस्वरूप जीवात्मा न तो जन्मता है और न मरता ही है। यह अजन्मा, नित्य, सदा रहनेवाला और पुराण है, शरीरका नाश होनेपर इसका नाश नहीं होता'† ( क०उ० १ । २ । १८ ) इत्यादि । इसलिये यह सर्वथा निर्विवाद है कि जीवात्मा स्वरूपसे उत्पन्न नहीं होता । सम्बन्ध—जीवकी नित्यताको दृढ़ करनेके लिये पुनः कहते हैं— ज्ञोऽत एव ॥ २ । ३ । १८ ॥ अतः=( वह नित्यचैतन्यरूप है ) इसलिये; एव=ही; ज्ञः=ज्ञाता है। व्याख्या—वह जीवात्मा स्वरूपसे जन्मने-मरनेवाला नहीं है, नित्य चेतन है, इसी- लिये वह ज्ञाता है। भाव यह कि वह जन्मने-मरनेवाला या घटने-बढ़नेवाला और अनित्य होता तो ज्ञाता नहीं हो सकता । किन्तु सिद्ध योगी अपने जन्म-जन्मान्तरोंकी बात जान लेता है तथा प्रत्येक जीवात्मा पहले शरीरसे सम्बन्ध छोड़कर जब दूसरे नवीन शरीरको धारण करता है, तब पूर्वस्मृतिके अनुसार स्तन-पानादिमे प्रवृत्त हो जाता है। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदिको भी प्रजोत्पादनका ज्ञान पहलेके अनुभवकी स्मृतिसे हो जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि जीव नित्य है और ज्ञानस्वरूप है. शरीरोके बदलनेमे जीवात्मा नहीं बदलता । सम्बन्ध—जीवात्मा नित्य है, शरीरके बदलनेसे वह नहीं बदलता, इस बातको प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं—
- यह मन्त्र पृष्ठ १६८ की टिप्पणीमे आ गया है। † न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥