भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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१७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ॥ २ । ३ । १९ ॥ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् = (एक ही जीवात्माके) शरीरसे उत्क्रमण करने, परलोकमें जाने और पुनः लौटकर आनेका श्रुतिमें वर्णन है (इससे भी यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा नित्य है)। व्याख्या—कठोपनिषद् (२ । २ । ७) में कहा है कि— योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ 'मरनेके बाद इन जीवात्माओंमेंसे अपने-अपने कर्मोंके अनुसार कोई तो वृक्षादि अचल शरीरको धारण कर लेते हैं और कोई देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जङ्गम शरीरोंको धारण कर लेते हैं।' प्रश्नोपनिषद्‌मे कहा है—'अथ यदि द्विमात्रेण मनसि संपद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते स सोमलोकं स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते।' (प्र० उ० ५ । ४)। अर्थात् 'जो इस ॐकारकी दो मात्राओका ध्यान करता है, वह मनोमय चन्द्रलोकको प्राप्त होता है। यजुर्वेदकी श्रुतियाँ उसे अन्तरिक्षवर्ती चन्द्रलोकमे ऊपरकी ओर ले जाती हैं; वहाँ स्वर्गलोकमे नाना प्रकारके ऐश्वर्योंका भोग करके वह पुनः मृत्युलोकमे लौट आता है।' इसी प्रकार अन्यान्य श्रुतियोंमें जीवात्माके वर्तमान शरीरको छोड़ने, परलोकमें जाने तथा वहाँसे पुनः लौटकर आनेका वर्णन है; इससे भी यही सिद्ध होता है कि शरीरके नाशसे जीवात्माका नाश नहीं होता, वह नित्य और अपरिवर्तनशील है। सम्बन्ध—कही हुई बातसे ही पुनः आत्माका नित्यत्व सिद्ध करते हैं— स्वात्मना चोत्तरयोः ॥ २ । ३ । २० ॥ उत्तरयोः=परलोकमे जाना और पुनः वहाँसे लौट आना—इन पीछे कही हुई दोनो क्रियाओंकी सिद्धि; स्वात्मना=स्वस्वरूपसे; च=ही होती है (इसलिये भी आत्मा नित्य है)। व्याख्या—उत्क्रान्तिका अर्थ है शरीरका वियोग। यह तो आत्माको नित्य न माननेपर भी होगा ही; किन्तु बादमें बतायी हुई गति और आगति अर्थात् परलोकमें जाना और वहाँसे लौटकर आना—इन दो क्रियाओंकी सिद्धि अपने