भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 227

२०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ श्रेष्ठात्=मुख्य प्राणसे भिन्न है; अन्यत्र=क्योकि दूसरी श्रुतियोमे; तद्व्यपदेशात्= उसका भिन्नतासे वर्णन है । व्याख्या—दूसरी श्रुतियोंमे मुख्य प्राणकी गणना इन्द्रियोसे अलग की गयी है तथा इन्द्रियोंको प्राणोके नामसे नहीं कहा गया है (मु० उ० २ । १ । ३) इसलिये पूर्वोक्त चक्षु आदि दसों इन्द्रियाँ और मन मुख्य प्राणसे सर्वथा भिन्न पदार्थ हैं। न तो वे मुख्य प्राणके कार्य हैं, न मुख्य प्राण उनकी भाँति इन्द्रियोकी गणनामे है । इन सबकी शरीरमें स्थिति मुख्य प्राणके अधीन है, इसलिये गौणरूपसे श्रुतिमे इन्द्रियों- को प्राणके नामसे कहा गया है । सम्बन्ध—इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणकी भिन्नता सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— भेदश्रुतेः ॥ २ । ४ । १८ ॥ भेदश्रुतेः=इन्द्रियोसे मुख्य प्राणका भेद सुना गया है, इसलिये ( भी मुख्य प्राण उनसे भिन्न तत्त्व सिद्ध होता है ) । व्याख्या—श्रुतिमें जहाँ इन्द्रियोका प्राणके नामसे वर्णन आया है, वहाँ भी उनका मुख्य प्राणसे भेद कर दिया गया है ( मु० उ० २ । १ । ३ तथा बृह० उ० १ । ३ । ३ ) तथा प्रश्नोपनिषद्मे भी मुख्य प्राणकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करने- के लिये अन्य सब तत्त्वोसे और इन्द्रियोसे मुख्य प्राणको अलग बताया है ( प्र० उ० २ । २, ३ ) । इस प्रकार श्रुतियोमे मुख्य प्राणका इन्द्रियोसे भेद बताया जानेके कारण यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राण इन सबसे भिन्न है । सम्बन्ध—इसके सिवा — वैलक्षण्याच्च ॥ २ । ४ । १९ ॥ वैलक्षण्यात्=परस्पर विलक्षणता होनेके कारण; च=भी ( यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राणसे इन्द्रियों भिन्न पदार्थ है ) । व्याख्या—सब इन्द्रियाँ और अन्त.करण सुषुप्तिके समय विलीन हो जाते हैं, उस समय भी मुख्य प्राण जागता रहता है, उसपर निद्राका कोई प्रभाव नहीं पड़ता । यही इन सबकी अपेक्षा मुख्य प्राणकी विलक्षणता है; इस कारण भी यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राणसे इन्द्रियाँ भिन्न हैं । न तो इन्द्रियों प्राणका