भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

सूत्र १८-२१ ] अध्याय २ २०७ कार्य या वृत्तियाँ है और न मुख्य प्राण ही इन्द्रिय है, इन्द्रियोको गौणरूपसे ही 'प्राण' नाम दिया गया है । सम्बन्ध-तेज आदि तत्त्वोंकी रचना करके परमात्माने जीवसहित उनमें प्रवेश करनेके पश्चात् नाम-रूपात्मक जगत्का विस्तार किया--यह श्रुतिमें वर्णन आया है । इस प्रसङ्गमें यह सन्देह होता है कि नाम-रूपादिक रचना करनेवाला कोई जीवविशेष है या परमात्मा ही । अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं- संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥ २ । ४ । २० ॥ संज्ञामूर्तिक्लृप्तिः=नाम-रूपकी रचना; तु=भी; त्रिवृत्कुर्वतः=तीनो तत्त्वोका मिश्रण करनेवाले परमेश्वरका ( ही कर्म है ); उपदेशात्=क्योकि वहाँ श्रुतिके वर्णनसे यही बात सिद्ध होती है । व्याख्या-इस समस्त नाम-रूपात्मक जगत्की रचना करना जीवात्माका काम नहीं है । वहाँ जो जीवात्माके सहित परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात कही गयी है, उसका अभिप्राय जीवात्माके कर्तापनमे परमात्माके कर्तृत्वकी प्रधानता बताना है, उसे सृष्टिकर्ता बताना नहीं; क्योंकि जीवात्माके कर्म-संस्कारोके अनुसार उसको कर्म करनेकी शक्ति आदि और प्रेरणा देनेवाला वही है । अतएव वहाँके वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि नाम-रूपसे व्यक्त की जाने- वाली इस जडचेतनात्मक जगत्की रचनारूप क्रिया उस परब्रह्म परमेश्वरकी ही है, जिसने उन तत्त्वोंको उत्पन्न करके उनका मिश्रण किया है; अन्य किसीकी नहीं। सम्बन्ध-उस परमात्माने तीनोंका मिश्रण करके उनसे यदि जगत्की उत्पत्ति की तो किस तत्त्वसे कौन पदार्थ उत्पन्न हुआ ? इसका विभाग किस प्रकार उपलब्ध होगा, इसपर कहते हैं— मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च ॥ २ । ४ । २१ ॥ ( जिस प्रकार ) मांसादि=मांस आदि; भौमम्=पृथिवीके कार्य बताये गये हैं, (वैसे ही ); यथाशब्दम्=वहाँ श्रुतिके शब्दद्वारा बताये अनुसार; इतरयोः= दूसरे दोनो तत्त्वोंका कार्य; च=भी समझ लेना चाहिये । व्याख्या-भूमि यानी पृथिवीके कार्यको भौम कहते हैं । उस प्रकरणमे जिस