भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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श्रीपरमात्मने नमः तीसरा अध्याय पहला पाद पूर्व दो अध्यायोंमें ब्रह्म और जीवात्माके स्वरूपका प्रतिपादन किया गया, अब उस परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिका उपाय बतानेके लिये तीसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसीलिये इस अध्यायको साधनाध्याय अथवा उपासनाध्याय कहते हैं। परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंमें सबसे पहले वैराग्यकी आवश्यकता है। संसारके अनित्य भोगोंमें वैराग्य होनेसे ही मनुष्यमें परमात्माको प्राप्त करनेकी शुभेच्छा प्रकट होती है और वह उसके लिये प्रयत्नशील होता है। अतः वैराग्योत्पादनके लिये बार-बार जन्म-मृत्यु और गर्भादिके दुःखोंका प्रदर्शन करनेके लिये पहला पाद आरम्भ किया जाता है। प्रलयके बाद सृष्टिकालमें उस परब्रह्म परमेश्वरसे जिस प्रकार इस जगत्की उत्पत्ति होती है, उसका वर्णन तो पहलेके दो अध्यायोंमें किया गया। उसके बाद वर्तमान जगत्में जो जीवात्माके शरीरोंका परिवर्तन होता रहता है, उसके विषयमें श्रुतियोंने जैसा वर्णन किया है, उसपर इस तीसरे अध्यायके प्रथम पादमें विचार किया जाता है। विचारका विषय यह है कि जब यह जीवात्मा पहले शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है, तब अकेला ही जाता है या और भी कोई इसके साथ जाता है। इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं— तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूप- णाभ्याम् ॥ ३ । १ । १ ॥ तदन्तरप्रतिपत्तौ = उक्त देहके बाद देहान्तरकी प्राप्तिके समय ( यह जीवात्मा ); संपरिष्वक्तः = शरीरके बीजरूप सूक्ष्म तत्त्वोंसे युक्त हुआ; रंहति = जाता है ( यह बात ); प्रश्ननिरूपणाभ्याम् = प्रश्न और उसके उत्तरसे सिद्ध होती है। व्याख्या—श्रुतियोंमें यह विषय कई जगह आया है, उनमेंसे जिस स्थलका वे० द० १४—