भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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२१० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ वर्णन स्पष्ट है, वह तो अपने-आप समझमें आ जाता है; परन्तु जहाँका वर्णन कुछ अस्पष्ट है, उसे स्पष्ट करनेके लिये यहाँ छान्दोग्योपनिषद्के प्रकरणपर विचार किया जाता है । वहाँ यह वर्णन है कि श्वेतकेतु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषिकुमार था, वह एक समय पाञ्चालोंकी सभामें गया । वहाँ प्रवाहण नामक राजाने उससे पूछा—'क्या तुम अपने पितासे शिक्षा पा चुके हो ?' उसने कहा—'हाँ ।' तब प्रवाहणने पूछा—'यहाँसे मरकर यह जीवात्मा कहाँ जाता है ? वहाँसे फिर कैसे लौटकर आता है ? देवयान और पितृयान-मार्गका क्या अन्तर है ? यहाँसे गये हुए लोगोसे वहाँका लोक भर क्यो नहीं जाता ?—इन सब बातोंको और जिस प्रकार पाँचवीं आहुतिमे यह जल पुरुषरूप हो जाता है, इस बातको तू जानता है या नहीं ?' तब प्रत्येक बातके उत्तरमे श्वेतकेतुने यही कहा—'मै नहीं जानता ।' यह सुनकर प्रवाहणने उसे फटकारा और कहा—'जब तुम इन सब बातोको नहीं जानते, तब कैसे कहते हो कि मै शिक्षा पा चुका ?' श्वेतकेतु लज्जित होकर पिताके पास गया और बोला कि 'प्रवाहण नामवाले एक साधारण क्षत्रियने मुझसे पाँच बातें पूछीं, किन्तु उनमेसे एकका भी उत्तर मै न दे सका । आपने मुझे कैसे कह दिया था कि मै तुमको शिक्षा दे चुका हूँ ।' पिताने कहा—'मै स्वयं इन पाँचोमेसे किसीको नहीं जानता, तब तुमको कैसे बताता ।' उसके'बाद अपने पुत्रके सहित पिता उस राजाके पास गया और धनादिके दानको स्वीकार न करके कहा—'आपने मेरे पुत्रसे जो पाँच बाते पूछी थीं, उन्हे ही मुझे बतलाइये ।' तब उस राजाने बहुत दिनोतक उन दोनोको अपने पास ठहराया और कहा कि 'आजतक यह विद्या क्षत्रियोके पास ही रही है, अब पहले-पहल आप ब्राह्मणोंको मिल रही है ।' यह कहकर राजा प्रवाहणने पहले उस पाँचवें प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया, जिसमे यह जिज्ञासा की गयी थी कि 'यह जल पाँचवीं आहुतिमे पुरुषरूप कैसे हो जाता है ?' वहाँ द्युलोकरूप अग्निमे श्रद्धाकी पहली आहुति देनेसे राजा सोमकी उत्पत्ति बतायी है । दूसरी आहुति है मेघरूप अग्निमें राजा सोमको हवन करना; उससे वर्षाकी उत्पत्ति बतायी गयी है । तीसरी आहुति है पृथ्वीरूप अग्निमे वर्षाको हवन करना; उससे अन्नकी उत्पत्ति बतायी गयी है । चौथी आहुति है पुरुषरूप अग्निमे अन्नका हवन करना; उससे वीर्यकी उत्पत्ति बतायी गयी है और पाँचवीं आहुति है स्त्रीरूप अग्निमे वीर्यका हवन करना; उससे