भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 237

२१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ 'वे वहाँ विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमे लौट आते हैं। इस प्रकार वेदोक्त धर्मका आचरण करनेवाले वे भोगकामी मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते रहते हैं' ( गीता ९ । २१ ) । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि उनको देवताओका अन्न कहना वहाँ गौणरूपसे है, वास्तवमें वहाँ जाकर वे अपने कर्मोंका ही फल भोगते है और फिर वहाँसे वापस लौट आते हैं। अतः जीवात्मा- का एक शरीरसे दूसरे शरीरमे सूक्ष्म तत्त्वोके सहित जाना सर्वथा सुसङ्गत है; इसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—“उक्त प्रकरणमें कहा गया है कि 'जबतक उसके कर्मोंका क्षय नही हो जाता, तबतक वह वहीं रहता है, फिर वहाँसे इस लोकमें लौट आता है।' अतः प्रश्न होता है कि उसके सभी पुण्यकर्म पूर्णतया समाप्त हो जाते हैं या कुछ कर्म शेष रहता है, जिसे साथ लेकर वह लौटता है?” इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं- कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां यथेत- मनेवं च ॥ ३ । १ । ८ ॥ कृतात्यये=किये हुए पुण्य कर्मोंका क्षय होनेपर; अनुशयवान् =शेष कर्म- संस्कारोंसे युक्त (जीवात्मा); यथेतम् =जैसे गया था उसी मार्गसे; च= अथवा; अनेवम् =इससे भिन्न किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता है; दृष्टस्मृतिभ्याम्= श्रुति और स्मृतियोंसे (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या-उस जीवके द्वारा किये हुए कर्मोंमेंसे जिनका फल भोगनेके लिये उसे स्वर्गलोकमे भेजा गया है, उन पुण्यकर्मोंका पूर्णतया क्षय हो जानेपर वह स्वर्गस्थ जीवात्मा अनुशयसे अर्थात् शेष कर्मसंस्कारोंसे युक्त होकर जिस मार्गसे गया था, उसीसे अथवा किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता है। इस प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है कि 'तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्........अथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनि- मापद्येरन्।' अर्थात् 'अच्छे आचरणोंवाले अच्छी योनिको प्राप्त होते हैं और बुरे आचरणोवाले बुरी योनियोंको प्राप्त होते हैं' (छा० उ० ५ । १० । ७) इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है तथा स्मृतिमे जो यह कहा गया है कि 'जो वर्णाश्रमी मनुष्य अपने कर्मोंमें स्थित रहनेवाले हैं, वे यहाँसे स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ कर्मोंका फल भोगकर बचे हुए कर्मोंके अनुसार अच्छे जन्म, कुल, रूप आदिको प्राप्त होते हैं' (गौतमस्मृति ११ । १) इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात सिद्ध होती है।