ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ८—१०] अध्याय ३ २१७ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण करते हैं— चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णा- जिनिः॥ ३ । १ । ९ ॥ चेत्=यदि ऐसा कहो कि; चरणात्=चरण शब्दका प्रयोग है, इसलिये ( यह कहना उचित नहीं है कि वह शेष कर्मसंस्कारोको साथ लेकर आता है ); इति न=तो ऐसी बात नहीं है; उपलक्षणार्था=क्योंकि वह श्रुति अनुशय ( शेष कर्म-संस्कारो ) का उपलक्षण करानेके लिये है; इति=यह बात; कार्ष्णा- जिनिः='कार्ष्णाजिनि'नामक आचार्य कहते हैं ( इसलिये कोई विरोध नहीं है )। व्याख्या—उपर्युक्त शङ्काका उत्तर अपनी ओरसे न देकर आचार्य कार्ष्णाजिनिका मत उपस्थित करते हुए सूत्रकार कहते हैं—यदि पूर्व- पक्षीद्वारा यह कहा जाय कि "यहाँ 'रमणीयचरणाः' इत्यादि श्रुतिमे तो चरण शब्दका प्रयोग है, जो कर्मसंस्कारका वाचक नहीं है; इसलिये यह सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा स्वर्गलोकसे लौटते समय बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए लौटता है" तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ जो 'चरण' शब्द है, वह अनुशयका उपलक्षण करानेके लिये है अर्थात् यह सूचित करनेके लिये है कि जीवात्मा भुक्तशेष कर्मसंस्कारको साथ लेकर लौटता है, अतः कोई दोष नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनमें पुनः शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥ ३ । १ । १० ॥ चेत्=यदि कहो; आनर्थक्यम्=(बिना किसी कारणके उपलक्षणके रूपमें 'चरण' शब्दका प्रयोग करना ) निरर्थक है; इति न=तो यह ठीक नहीं, क्योंकि; तदपेक्ष- त्वात्=कर्माशयमें आचरण आवश्यक है । व्याख्या—यदि यह कहा जाय कि यहाँ 'चरण' शब्दको बिना किसी कारण- के कर्मसंस्कारका उपलक्षग मानना निरर्थक है, इसलिये उपर्युक्त उत्तर ठीक नहीं है, तो ऐसी बात नहीं है, उपर्युक्त उत्तर सर्वथा उचित है; क्योंकि कर्म- संस्काररूप अनुशय पूर्वकृत शुभाशुभ आचरणोंसे ही बनता है, अतः कर्माशयके लिये आचरण अपेक्षित है, इसलिये 'चरण' शब्दका प्रयोग निरर्थक नहीं है।