ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ कारण; नातिचिरेण=जीव उन आकाश, वायु आदिके रूपमे अधिक कालतक न रहकर क्रमशः नीचे उतर आते है। व्याख्या-ऊपरके लोकमे जानेका जो वर्णन है, वह कर्मोंके फलभोगसे सम्बन्ध रखता है, इसलिये बीचमें आये हुए पितृलोक आदिमें विलम्ब होना भी सम्भव है, परन्तु लौटते समय कर्मभोग तो समाप्त हो जाते हैं, इसलिये बीचमें कहीं विलम्ब होनेका कोई कारण नहीं रहता । इस प्रकार ऊपरके लोकोंमें जाने और वहाँसे लौटनेकी गतिमे विशेषता होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि लौटते समय रास्तेमे विलम्ब नहीं होता । सम्बन्ध-अब यह जिज्ञासा होती है कि परलोकसे लौटनेवाले उस जीवात्मा- का जो धान, जौ, तिल और उड़द आदिके रूपमें होना कहा गया है, उसका क्या भाव है ? क्या वह स्वयं वैसा बन जाता है या उस योनिको भोगनेवाला जीवात्मा कोई दूसरा होता है, जिसके साथमें यह भी रहता है, इसपर कहते हैं— अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् ॥ ३ । १ । २४ ॥ पूर्ववत्=पहलेकी भाँति ही; अभिलापात्=यह कथन है, इसलिये; अन्याधिष्ठितेषु=दूसरे जीवात्मा अपने कर्मफलभोगके लिये जिनमे स्थित हो रहे हैं, ऐसे धान, जौ आदिमें केवल सन्निधिमात्रसे इसका निवास है । व्याख्या-जिस प्रकार पूर्वसूत्रमे यह बात कही गयी है कि वह लौटनेवाला जीवात्मा आकाश आदि नहीं बनता, उनके सदृश होकर ही उनसे संयुक्त होता है, उसी प्रकार यहाँ धान आदिके विषयमे भी समझना चाहिये; क्योकि यह कथन भी पहलेके सदृश ही है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उन धान, जौ आदिमे अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये जो दूसरे जीव पहलेसे ही स्थित हैं, उनसे संयुक्त होकर ही यह चन्द्रलोकमे लौटनेवाला जीवात्मा उनके साथ-साथ पुरुषके उदरमे चला जाता है; धान, जौ आदि स्थावर-योनियोंको प्राप्त नहीं होता। सम्बन्ध-इसपर शङ्का उपस्थित करके ग्रन्थकार उसका निराकरण करते हैं - अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥ ३ । १ । २५ ॥ चेत्=यदि कहा जाय कि; अशुद्धम्=यह तो अशुद्ध ( पाप ) कर्म होगा; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; शब्दात्=श्रुतिके वचनसे इसकी निर्दोषता सिद्ध होती है। व्याख्या-यदि यह शङ्का की जाय कि अनाजके प्रत्येक दानेमें जीव रहता