ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २४-२७ ] अध्याय ३ २२५ है, इस मान्यताके अनुसार अन्नको पीसना, पकाना और खाना तो बडा अशुद्ध ( पाप ) कर्म होगा, क्योकि उसमें तो अनेक जीवोकी हिंसा करनेपर एक जीवकी उदरपूर्ति होगी' तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि इस प्रकरणमे पुरुषको 'अग्नि' बताकर उसमे अन्नका हवन करना बताया है तथा श्रुतिमे जगह-जगह अन्नके खाये जानेका वर्णन है ( छा० उ० ६ । ६ । २)। अतः श्रुतिका विधान होनेके कारण उसमे हिंसा नहीं होती तथा उन जीवोकी उस कालमे सुषुप्ति-अवस्था रहती है, जब वे पृथिवी और जलके सम्बन्धसे अङ्कुरित होते हैं, तब उनमे चेतना आती है और सुख-दुःखका ज्ञान होता है, पहले नहीं। अतः अन्नभक्षणमे हिंसा नहीं है। सम्बन्ध-अन्नसे सयुक्त होनेके बाद वह किस प्रकार कर्मफल-भोगके लिये शरीर धारण करता है, उसका क्रम बतलाते हैं--- रेतःसिग्योगोऽथ ॥ ३ । १ । २६ ॥ अथ=उसके बाद; रेतःसिग्योगः = वीर्यका सेचन करनेवाले पुरुषके साथ उसका सम्बन्ध होता है। व्याख्या-उसके अनन्तर वह जीवात्मा अन्नके साथ पुरुषके पेटमे जाकर उसके वीर्यमे प्रविष्ट हो उस पुरुषसे संयुक्त होता है, इस कथनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि आकाश आदिसे लेकर अन्नतक सभी जगह केवल संयोगसे ही उसका तदाकार होना कहा गया है; स्वरूपसे नहीं। सम्बन्ध-उसके बाद- योनेः शरीरम् ॥ ३ । १ । २७ ॥ योनेः=स्त्रीकी योनिमे प्रविष्ट होनेके अनन्तर; शरीरम् = वह जीवात्मा कर्म- फलभोगके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। व्याख्या-इस प्रकार वह खर्गसे आनेवाला जीवात्मा पहले पुरुषके वीर्यके आश्रित होता है। फिर उस पुरुषद्वारा गर्भाधानके समय स्त्रीकी योनिमें वीर्यके साथ प्रविष्ट करा दिया जाता है। वहाँ गर्भाशयसे सम्बद्ध होकर उक्त जीव अपने कर्मफलोके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। यहींसे उसके कर्मोंके फलका भोग आरम्भ होता है। इसके पहले खर्गसे उतरकर वीर्यमे प्रविष्ट होनेतक उसका कोई जन्म या शरीर धारण करना नहीं है, केवल उन-उन आकाश आदिके आश्रित रहनामात्र कहा गया है; उन धान आदि शरीरोंके अधिष्ठाता जीव दूसरे ही हैं। पहला पाद सम्पूर्ण । वे० द० १५-