ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २२९ पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॥ ३ । २ । ५ ॥ ( जीवात्मामे भी ईश्वरके समान गुण है ) तु=किन्तु; तिरोहितम्=छिपे हुए ( आवृत्त ) है; पराभिध्यानात्=( अतः ) परब्रह्म परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे ( वे प्रकट हों जाते है ); हि=क्योकि; ततः=उस परमात्माके सकाशसे ही; अस्य=इसके; बन्धविपर्ययौ=बन्धन और उसके विपरीत अर्थात् मोक्ष है । व्याख्या—जीवात्मा ईश्वरका अंश है, इसलिये यह भी ईश्वरके सदृश गुणों- वाला है, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है; परन्तु इसके वे सब गुण तिरोहित है— छिपे हुए हैं; इस कारण उनका उपयोग नहीं देखा जाता । उस परब्रह्म परमेश्वरका निरन्तर ध्यान करनेसे जीवके वे छिपे हुए गुण पुनः प्रकट हो सकते हैं ( श्वे० उ० १ । ११ ) । परमेश्वरकी आराधनाके बिना अपने-आप उनका प्रकट होना सम्भव नहीं है, क्योकि इस जीवका अनादिसिद्ध बन्धन और उससे मुक्त होना उस जगत्कर्ता परमेश्वरके ही अधीन है ( श्वे० उ० ६ । १६ ) । इसलिये वह स्वयं स्वप्नकी सृष्टि आदि कुछ नहीं कर सकता ।* सम्बन्ध—इस जीवात्माके जो वास्तविक ईश्वरसम्बन्धी गुण हैं, वे क्यों छिपे हुए हैं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— देहयोगाद्वा सोऽपि ॥ ३ । २ । ६ ॥ सः=वह तिरोभाव; अपि=भी; देहयोगात्=शरीरके सम्बन्धसे; वा= ही है । व्याख्या—इस जीवात्मामे उस परब्रह्म परमात्माके स्वाभाविक गुण विद्यमान रहते हुए भी जो उन गुणोंका तिरोभाव हो रहा है, वे गुण प्रकट नहीं हो रहे हैं तथा यह जीवात्मा जो उन सब गुणोंसे सर्वथा अनभिज्ञ है, इसका मुख्य कारण जीवात्माका शरीरके साथ एकताको प्राप्त हो जाना ही है । यही इसका बन्धन है और यह अनादिकालसे है । इसीके कारण जन्म-जन्मान्तरोंके कर्म-
- साधकको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर उस परमदयालु, सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरके आश्रित होकर निरन्तर उसका भजन-ध्यान करे और इस बन्धनसे छुटकारा पानेके लिये भगवान्से प्रार्थना करे । इस जगत्रूप नाटकका सूत्रधार परमेश्वर जिसको उस प्रपञ्चसे अलग करना चाहे, वही इससे अलग हो सकता है ।