ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ संस्कारोसे परवश हुआ यह जीव नाना योनियोमे जन्म लेता और मरता है तथा भाँति-भाँतिके दुःखोंका उपभोग कर रहा है । सम्बन्ध—यहाँतक स्वप्नावस्थापर विचार किया गया, उसमें प्रसङ्गवश जीवात्माके बन्धन और उससे छूटनेके उपायका भी संक्षेपमें वर्णन हुआ । अब जीवात्माकी सुषुप्ति-अवस्थापर विचार करनेके लिये अगला प्रसङ्ग आरम्भ किया जाता है । प्रायः यह कहा जाता है कि सुषुप्ति-अवस्थामें जीवात्माका ब्रह्मसे संयोग होता है, इससे यह भ्रान्त धारणा हो सकती है कि सुषुप्ति भी समाधिके सदृश कोई सुखप्रद अवस्था है । अतः इस भ्रमका निवारण करनेके लिये कहते हैं— तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च ॥ ३ । २ । ७ ॥ तदभावः=(सुषुप्ति-अवस्थामे ) उस स्वप्नदृश्यका अभाव हो जाता है ( उस समय जीवात्मा ); नाडीषु=नाडियोमे (.स्थित हो जाता है ); तच्छ्रुतेः=क्योकि वैसा ही श्रुतिका कथन है; च=तथा; आत्मनि=आत्मामे भी ( उसकी स्थिति बतायी गयी है ) । व्याख्या—पूर्व सूत्रोमे जो स्वप्नावस्थाका वर्णन किया गया है, उसका उपभोग करते समय यह जीवात्मा कभी तो स्वप्नसे जग जाता है और कभी फिर स्वप्नमे स्थित हो जाता है, पुनः जगता और फिर स्वप्नावस्थामें चला जाता है ( बृह० उ०-४ । ३ । १० से १८ तक ) । इस प्रकार स्वप्नगत मानसिक सुख-दुःखोंका उपभोग करते-करते कभी सुषुप्ति-अवस्था हो जानेपर स्वप्नके दृश्योका अभाव हो जाता है । इससे यह सिद्ध होता है कि वे मायामात्र हैं; क्योंकि बाह्यजगत्का अभाव नहीं होता, उसका कार्य ज्यो-का-त्यो चलता रहता है तथा जीवात्मा- का शरीर भी सुरक्षित रहता है, इसलिये उसका सत् होना सिद्ध होता है । उस समय जीवात्माको इस प्रपञ्चके उपभोगसे विश्राम मिलता है तथा शरीर और इन्द्रियोंकी थकावट दूर होती है । वह अवस्था आनेपर जीवात्माकी स्थिति कैसी और कहाँ रहती है, इस विषयमें श्रुति कहती है—'जब यह सुषुप्ति-अवस्थाको प्राप्त होता है, तब कुछ भी नहीं जानता; इसके शरीरमे जो बहत्तर हजार हिता नामकी नाडियाँ हृदयसे निकलकर समस्त शरीरमे व्याप्त हो रही है, उनमे फैलकर यह समस्त शरीरमें व्याप्त हुआ शयन करता है।' ( बृह०उ० २ । १ । १९ ) दूसरी श्रुतिमे