ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ८—१० ] अध्याय ३ २३३ सकती; एवं श्रुतिमे भी जगह-जगह जो सोता है, उसीके जगनेकी बात कही गयी है ( बृह० उ० ४ । ३ । १६ )। और कर्म करनेकी जो वेदोंमे आज्ञा दी गयी है, उसकी सफलता भी जो सोता है, उसीके जगनेसे होगी; क्योकि एकको दी हुई आज्ञाका दूसरा कैसे पालन कर सकेगा। इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि जो जीवात्मा सुषुप्तिकालमे विलीन होता है, वही जगता है। सम्बन्ध—जब मनुष्य किसी औषध आदिसे मूर्च्छित कर दिया जाता है अथवा अन्य किन्हीं बीमारी आदि कारणोंसे अचेत हो जाता है, उस समय भी न तो बाहरी जगत्का ज्ञान रहता है, न स्वप्न देखता है और न सुखका ही अनुभव करता है, वह कौन-सी अवस्था है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— मुग्धेऽर्द्धसम्पत्तिः परिशेषात् ॥ ३ । २ । १० ॥ मुग्धे=मूर्च्छाकालमे; अर्द्धसम्पत्तिः=अधूरी सुषुप्ति-अवस्था माननी चाहिये; परिशेषात्=क्योकि अन्य कोई अवस्था शेष नहीं है। व्याख्या—जन्मके बाद मरनेसे पहले जीवकी पूर्वोक्त तीन अवस्थाएँ ही प्रसिद्ध हैं। किसी विशेष कारणसे कभी-कभी हो जानेवाली यह मुग्धावस्था सबकी और सदैव नहीं होती, अतः इसके लक्षण कुछ-कुछ सुषुप्तिमे ही सङ्गत हो सकते हैं। इसलिये इसे अधूरी सुषुप्ति मानना ही उचित है; क्योकि उस अवस्थामे सुषुप्तिका सुखलाभ नहीं होता, केवल अज्ञानमात्रमे ही सुषुप्तिसे इसकी समता है; अतः इसे पूर्णतया सुषुप्ति भी नहीं कहा जा सकता। सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणसे जीवात्माकी जाग्रत् आदि अवस्थाओंका निरूपण किया गया। उसमें प्रसङ्गवश यह बात भी कही गयी कि उस परब्रह्म परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन करनेपर यह जीव कर्मबन्धनसे मुक्त हो सकता है। जिसके ध्यानका यह महान् फल बताया गया है, उस परब्रह्म परमात्माका क्या स्वरूप है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि श्रुतियोंमें कहीं तो उस परमेश्वरको सर्वथा निर्विशेष निर्गुण बताया गया है ( क० उ० १ । ३ । १५, मा० उ० ७ )। कहीं उसको सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सर्वसाक्षी तथा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कारण कहा गया है ( मा० उ० ६ )। कहीं उसे सर्वव्यापी और कहीं अङ्गुष्ठमात्र बताया गया है। कहीं क्रियाशील और