भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

२३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ कहीं अक्रिय कहा गया है; अतः उसका वास्तविक स्वरूप क्या है ? तथा हृदय आदि जिन-जिन स्थानोंमें परमात्माकी स्थिति बतायी गयी है। उनके दोषोंसे वह लिप्त होता है या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि॥ ३ । २ । ११ ॥ स्थानतः=स्थानके सम्बन्धसे; अपि=भी; परस्य=परब्रह्म परमात्माका; न= किसी प्रकारके दोषसे संसर्ग नहीं होता; हि=क्योंकि; सर्वत्र=सभी वेदवाक्योंमें उस ब्रह्मको; उभयलिङ्गम्=दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त अर्थात् सब प्रकारके दोषोंसे रहित निर्विशेष तथा समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न बताया गया है। व्याख्या—कठोपनिषद्मे कहा है कि 'अणोरणीयान् महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्' (क० उ० १ । २ । २०) इस जीवात्माके हृदयरूप गुहामे रहनेवाला परमात्मा छोटे-से-छोटा तथा बड़े-से-बड़ा है। 'वह ब्रह्म बैठा हुआ ही दूर चला जाता है, सोता हुआ ही सब ओर चला जाता है।' (क० उ० १ । २ । २१) 'वह जीवात्माके साथ उसकी हृदयगुहामे स्थित है' (क० उ० १ । ३ । १), 'वह सब धर्मोंसे रहित है।' (क० उ० १ । ३ । १५) 'भूत और भविष्यका शासक है।' (क० उ० २ । १ । १२-१३) 'उस परब्रह्ममें नाना भेद नहीं है।' (क० उ० २ । १ । ११) 'उसके भयसे अग्नि आदि देवता अपने-अपने कार्योंमें संलग्न रहते हैं।' (क० उ० २ । ३ । ३) इसी प्रकार अन्य श्रुतियोंमें भी जहाँ इसको निर्विशेष कहा है, उसी प्रकरणमें नाना प्रकारके दिव्य गुणोंसे युक्त भी बताया है (श्वे० उ० ३ । १९) तथा जो इसके दिव्य गुण बताये गये हैं, वे जीव और प्रकृति—इन दोनोंसे विलक्षण हैं। अतः यह भी नहीं कहा जा सकता कि ये दिव्य गुण जीवात्माके या जड प्रकृतिके हैं अथवा उपाधिके कारण उस परब्रह्ममें इनका आरोप किया गया है, क्योंकि परब्रह्म परमात्मा उपाधिसे रहित है। अतः यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा स्वभावसे ही दोनों प्रकारके लक्षणवाला है अर्थात् वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित निर्विशेष तथा समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न है, इसलिये सर्वत्र व्याप्त और समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहकर भी वह परमात्मा उन-उन वस्तुओं और स्थानोंके दोषोंसे लिप्त नहीं होता। उसमे परस्परविरोधी लक्षण एक साथ रह सकते हैं; क्योकि वह सर्वशक्तिमान् और सांसारिक पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण है। लौकिक वस्तुओंके साथ तुलना करके उसका स्वरूप