ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 260, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १७-१८] अध्याय ३ २३९ तथा जो सबका ईश्वर एवं अविनाशी है ।'* ( १५ । १७ ) इस प्रकार परब्रह्म पुरुषोत्तमके सगुण स्वरूपका वर्णन करके अन्तमे यह भी कहा है कि 'जो मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सब कुछ जाननेवाला है ।'† ( १५ । १९ ) । इस प्रकारके बहुत-से वचन स्मृतियोंमें पाये जाते हैं, जिनमे भगवान्के सगुण रूपका वर्णन है और उसे वास्तविक बताया गया है। इसी तरह श्रुतियो और स्मृतियोंमे परमेश्वरके निर्गुण-निर्विशेष रूपका भी वर्णन पाया जाता है ‡ और वह भी सत्य है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि ब्रह्म दोनो प्रकारके लक्षणोंवाला है । सम्बन्ध—उस परब्रह्म परमेश्वरका सगुणरूप उपाधि-भेदसे नहीं, किन्तु स्वाभाविक है, इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा प्रमाण देते हैं— अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥ ३ । २ । १८ ॥ च=और; अत एव=इसीलिये अर्थात् उस परमेश्वरका उभय रूप स्वाभाविक हैं, यह सिद्ध करनेके लिये ही; सूर्यकादिवत्=सूर्य आदिके प्रतिबिम्बकी भाँति; उपमा=उपमा दी गयी है । व्याख्या—'सब भूतोका आत्मा परब्रह्म परमेश्वर एक है, तथापि वह भिन्न- भिन्न प्राणियोमे स्थित है. अतः जलमे प्रतिबिम्बित चन्द्रमाकी भाँति एक और अनेक रूपसे भी दीखता है ।'§ ( ब्रह्मविन्दु उ० १२ ) इस दृष्टान्तसे यह बात दिखायी गयी है कि वह सर्वान्तर्यामी परमेश्वर सगुण और निर्गुण-भेदसे अलग- अलग नहीं, किन्तु एक ही है; तथापि प्रत्येक जीवात्मामे अलग-अलग दिखायी दे रहा है। यहाँ चन्द्रमाके प्रतिबिम्बका दृष्टान्त देकर यह भाव दिखाया गया है कि जैसे सूर्य और चन्द्रमा आदिमें जो प्रकाश गुण है, वह स्वाभाविक है, उपाधिसे नहीं है; उसी प्रकार परमात्मामे भी सत्यसङ्कल्पत्व, सर्वज्ञत्व
- उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ † यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद् ............ ॥ ‡ देखिये कठोपनिषद् १ । ३ । १५, मुण्डक० १ । १ । ६ तथा माण्डूक्य० ७ । § एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥