ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ और सर्वव्यापित्वादि गुण स्वाभाविक हैं, उपाधिसे नहीं हैं। दूसरा यह भाव दिखाया है कि जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलमे अलग-अलग दीखता हुआ भी एक है, उसी प्रकार परमात्मा सब प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे , अलग- अलगकी भाँति स्थित हुआ भी एक ही है, तथा वह सबमें रहता हुआ भी उन-उनके गुण-दोषोंसे अलिप्त है। गीताके निम्नाङ्कित वचनसे भी इसी सिद्धान्त- की पुष्टि होती है 'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।' 'वह परमात्मा विभागरहित है तो भी विभक्तकी भाँति सब प्राणियोमे स्थित है' इत्यादि (गी० १३ । १६) यही उसकी विचित्र महिमा है। सम्बन्ध—यहाँ प्रतिबिम्बका दृष्टान्त दिया जानेके कारण यह भ्रम हो सकता है कि परमात्माका सब प्राणियोंमें रहना प्रतिबिम्बकी भाँति मिथ्या ही है, वास्तवमें नहीं है; अतः इस भ्रमकी निवृत्तिके लिये अगला सूत्र कहते हैं— अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम् ॥ ३ । २ । १९ ॥ तु=किन्तु; अम्बुवत्=जलमे स्थित चन्द्रमाकी भाँति; अग्रहणात्=परमात्मा- का ग्रहण न होनेके कारण (उस परमेश्वरको); तथात्वम्=सर्वथा वैसा; न=नहीं समझना चाहिये । व्याख्या—पूर्व सूत्रमे परमेश्वरको समस्त प्राणियोमे स्थित बताते हुए जलमें दीखनेवाले चन्द्रमाका दृष्टान्त दिया; किन्तु पूर्णतया वह दृष्टान्त परमात्मामे नहीं घटता; क्योंकि चन्द्रमा वस्तुतः जलमे नहीं है, केवल उसका प्रतिबिम्ब दीखता है। किन्तु परमात्मा तो स्वयं सबके हृदयमें सचमुच ही स्थित है और उन-उन जीवोके कर्मानुसार उनको अपनी शक्तिके द्वारा संसारचक्रमे भ्रमण कराता है (गीता १८ । ६१) । अतः चन्द्रमाके प्रतिबिम्बकी भाँति परमेश्वरकी स्थिति नहीं है। यहाँ दृष्टान्तका केवल एक अंश लेकर ऐसा समझना चाहिये कि परमेश्वर एक होकर भी नाना-सा दीखता है, वास्तवमे वह नाना नहीं है, तथापि सर्वशक्तिमान् होनेके कारण अलग-अलग प्राणियोमे एक रूपसे स्थित है। सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है तो प्रतिबिम्बका दृष्टान्त क्यों दिया गया ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम् ॥ ३ । २ । २० ॥