ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ भोगोंका विधान करता है।' इन वेदवाक्योंसे भी यही सिद्ध होता है कि जीवोंके कर्मफलकी व्यवस्था करनेवाला परमेश्वर ही है। सम्बन्ध—इस विषयमें आचार्य जैमिनिका मत उपस्थित किया जाता है— धर्मं जैमिनिरत एव ॥ ३ । २ । ४० ॥ अत एव=पूर्वोक्त कारणोंसे ही; जैमिनिः=जैमिनि; धर्मम्=धर्म (कर्म) को (फलदाता) कहते हैं। व्याख्या—जैमिनि आचार्य मानते हैं कि उक्ति और वैदिक प्रमाण—इन दोनो कारणोंसे यह सिद्ध होता है कि धर्म अर्थात् कर्म स्वयं ही फलका दाता है; क्योकि यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि खेती आदि कर्म करनेसे अन्नकी उत्पत्तिरूप फल होता है। इसी प्रकार वेदमें भी 'अमुक फलकी इच्छा हो तो अमुक कर्म करना चाहिये,' ऐसा विधि-वाक्य होनेसे यही सिद्ध होता है कि कर्म स्वय ही फल देनेवाला है, उसमे भिन्न किसी कर्मफलदाताकी कल्पना आवश्यक नहीं है। सम्बन्ध—आचार्य जैमिनिके इस कथनको अयुक्त सिद्ध करते हुए सूत्रकार अपने मतको ही उपादेय बताते हैं— पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् ॥ ३ । २ । ४१ ॥ तु=परन्तु; बादरायणः=वेदव्यास; पूर्वम्=पूर्वकथनानुसार परमेश्वरको ही कर्मफलदाता मानते हैं; हेतुव्यपदेशात्=क्योकि वेदमे उसीको सबका कारण बताया गया है ( इसलिये जैमिनिका कथन ठीक नहीं है)। व्याख्या—सूत्रकार व्यासजी कहते हैं कि जैमिनि जो कर्मको ही फल देनेवाला कहते हैं, वह ठीक नहीं; कर्म तो निमित्तमात्र होता है, वह जड, परिवर्तनशील और क्षणिक होनेके कारण फलकी व्यवस्था नहीं कर सकता; अतः जैसा कि पहले कहा गया है, वह परमेश्वर ही जीवोके, कर्मानुसार, फल देनेवाला है; क्योंकि श्रुतिमे ईश्वरको ही सबका हेतु बताया गया है। दूसरा पाद सम्पूर्ण।