ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा पाद दूसरे पादमें जीवकी स्वप्नावस्था एवं समाधि-अवस्थाका वर्णन करके परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपके विषयमें यह निर्णय किया गया कि वह निर्गुण-सगुण दोनों लक्षणोंवाला है। तत्पश्चात् उस परब्रह्म परमेश्वरका अपनी शक्तिस्वरूप परा और अपरा प्रकृतियोंसे किस प्रकार अभेद है और किस प्रकार भेद है, इसका निरूपण किया गया। फिर अन्तमें यह निश्चित किया गया कि जीवोंके कर्मफल- की व्यवस्था करनेवाला एकमात्र वह परब्रह्म परमेश्वर ही है। अब वेदान्तवाक्योंमें जो एक ही आत्मविद्याका अनेक प्रकारसे वर्णन किया गया है, उसकी एकता बताने तथा नाना स्थलोंमें आये हुए भगवत्प्राप्तिविषयक भिन्न-भिन्न वाक्योंके विरोधको दूर करके उनकी एकताका प्रतिपादन करनेके लिये यह तीसरा पाद आरम्भ किया जाता है— सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् ॥ ३ । ३ । १ ॥ सर्ववेदान्तप्रत्ययम्=समस्त उपनिषदोंमे जो अध्यात्मविद्याका वर्णन है, वह अभिन्न है; चोदनाद्यविशेषात् =क्योंकि आज्ञा आदिमें अभेद है। व्याख्या—उपनिषदोंमे जो नाना प्रकारकी अध्यात्मविद्याओका वर्णन है, उन सबमें विधि-वाक्योंकी एकता है अर्थात् सभी विद्याओंद्धारा एकमात्र उस परब्रह्म परमात्माको ही जाननेके लिये कहा गया है तथा सबका फल उसीकी प्राप्ति बताया गया है, इसलिये उन सबकी एकता है। कहीं तो 'ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ।' ( छा० उ० १ । ४ । १ ) 'ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इस प्रकार इसकी उपासना करे' इत्यादि वाक्योंमें प्रतीकोपासना- का वर्णन करके उसके द्वारा उस परब्रह्मको लक्ष्य कराया गया है और कहीं 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म'—'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है', ( तै० २ । १ ) 'यही सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, सबका परम कारण, सब प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका स्थान है' ( मा० उ० ६ ) । इस प्रकार विधिमुखसे उसके कल्याणमय दिव्य लक्षणोंद्वारा उसको लक्ष्य कराया गया है तथा कहीं 'शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और गन्धरहित तथा अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त ( सीमारहित ), सर्वश्रेष्ठ' ( क० उ० १ । ३ । १५ ) इस प्रकार समस्त