भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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श्रीपरमात्मने नमः निवेदन त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥ महर्षि वेदव्यासरचित ब्रह्मसूत्र बड़ा ही महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें थोड़े-से शब्दोंमें परब्रह्मके स्वरूपका साङ्गोपाङ्ग निरूपण किया गया है, इसीलिये इसका नाम 'ब्रह्मसूत्र' है। यह ग्रन्थ वेदके चरम सिद्धान्तका निदर्शन कराता है, अतः इसे 'वेदान्त-दर्शन' भी कहते हैं। वेदके अन्त या शिरोभाग—ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद्‌के सूक्ष्म तत्त्वका दिग्दर्शन करानेके कारण भी इसका उक्त नाम सार्थक है। वेदके पूर्वभागकी श्रुतियोंमें कर्मकाण्डका विषय है, उसकी समीक्षा आचार्य जैमिनिने पूर्वमीमांसा-सूत्रोंमे की है। उत्तरभागकी श्रुतियोंमें उपासना एवं ज्ञानकाण्ड है; इन दोनोंकी मीमांसा करनेवाले वेदान्त-दर्शन या ब्रह्मसूत्रको 'उत्तर मीमांसा' भी कहते हैं। दर्शनोंमें इसका स्थान सबमे ऊँचा है; क्योंकि इसमें जीवके परम प्राप्य एवं चरम पुरुषार्थका प्रतिपादन किया गया है। प्रायः सभी सम्प्रदायोंके प्रधान-प्रधान आचार्योंने ब्रह्मसूत्रपर भाष्य लिखे हैं और सबने अपने-अपने सिद्धान्तको इस ग्रन्थका प्रतिपाद्य बतानेकी चेष्टा की है। इससे भी इस ग्रन्थकी महत्ता तथा विद्वानोंमें इसकी समादरणीयता सूचित होती है। प्रस्थानत्रयीमें ब्रह्मसूत्रका प्रधान स्थान है। संस्कृत भाषामें इस ग्रन्थपर अनेक भाष्य एवं टीकाएँ उपलब्ध होती हैं; परंतु हिन्दीमें कोई सरल तथा सर्वसाधारणके समझने योग्य टीका नहीं थी; इससे हिन्दीभाषा-भाषियोंके लिये इस गहन ग्रन्थका भाव समझना बहुत कठिन हो रहा था। यद्यपि 'अच्युत ग्रन्थमाला' ने ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य एवं रत्नप्रभा व्याख्याका हिन्दीमें अनुवाद प्रकाशित करके हिन्दी-जगत्‌का महान् उपकार किया है; तथापि भाष्यकारकी व्याख्या शास्त्रार्थकी शैलीपर लिखी जानेके कारण साधारण बुद्धिवाले पाठकोंको उसके द्वारा सूत्रकारके भावों