भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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( ४ ) समझनेमे कठिनाई होती है। इसके सिवा, वह ग्रन्थ भी बहुत बड़ा एवं बहुमूल्य हो गया है। जिससे साधारण जनता उसे प्राप्त भी नहीं कर सकती। अतः हिन्दीमें ब्रह्मसूत्रके एक ऐसे संस्करणको प्रकाशित करनेकी आवश्यकता प्रतीत हुई, जो सर्वसाधारणके लिये समझनेमें सुगम एवं सस्ता होनेके कारण सुलभ हो। इन्हीं बातोंको दृष्टिमे रखकर गतवर्ष वैशाख मासमें, जब मै गोरखपुरमें था, मेरे एक पूज्य स्वामीजी महाराजने मुझे आज्ञा दी कि 'तुम सरल हिन्दीमें ब्रह्मसूत्रपर संक्षिप्त व्याख्या लिखो।' यद्यपि अपनी अयोग्यताको समझकर मै इस महान् कार्यका भार अपने ऊपर लेनेका साहस नहीं कर पाता था, तथापि पूज्य स्वामीजीकी आग्रहपूर्ण प्रेरणाने मुझे इस कार्यमें प्रवृत्त कर दिया। मै उसी समय गोरखपुरसे स्वर्गाश्रम (ऋषिकेश) चला गया और वहाँ पूज्यपाद भाईजी श्रीजयदयालजीसे स्वामीजीकी उक्त आज्ञा निवेदन की। उन्होंने भी इसका समर्थन किया। इससे मेरे मनमे और भी उत्साह और बल प्राप्त हुआ। भगवान्‌की अव्यक्त प्रेरणा मानकर मैंने कार्य प्रारम्भ कर दिया और उन्हीं सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी सहज कृपासे एक मास इक्कीस दिनमे ब्रह्मसूत्रकी यह व्याख्या पूरी हो गयी। इसमें व्याकरणकी दृष्टिसे तो बहुत-सी अशुद्धियाँ थीं ही, अन्य प्रकारकी भी त्रुटियाँ रह गयी थीं, अतः इस व्याख्याकी एक प्रति नकल कराकर मैंने उन्हीं पूज्य स्वामीजीके पास गोरखपुर भेज दी। उन्होंने मेरे प्रति विशेष कृपा और स्वाभाविक प्रेम होनेके कारण समय निकालकर दो मासतक परिश्रमपूर्वक इस व्याख्याको देखा और इसकी त्रुटियोंका मुझे दिग्दर्शन कराया। तदनन्तर चित्रकूटमे सत्सङ्गके अवसरपर पूज्यपाद श्रीभाई जयदयालजी तथा पूज्य स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराजने भी व्याख्याको आद्योपान्त सुना और उसके संशोधनके सम्बन्धमें अपनी महत्त्वपूर्ण सम्मति देनेकी कृपा की। यह सब हो जानेपर इस ग्रन्थको प्रकाशित करनेकी उत्सुकता हुई। फिर समय मिलते ही मै गोरखपुर आ गया। फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदासे इसके पुनः संशोधन और छपाई आदिका कार्य आरम्भ किया गया। इस समय पूज्य पण्डित श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने इस व्याख्यामें व्याकरण आदिकी दृष्टिसे जो-जो अशुद्धियाँ रह गयी थीं, उनका अच्छी तरह संशोधन किया और भाषाको भी सुन्दर बनानेकी पूरी-पूरी चेष्टा की। साथ ही