ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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आदिसे अन्ततक साथ रहकर प्रूफ देखने आदिके द्वारा भी प्रकाशनमें पूरा सहयोग किया। पूज्य भाई श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार तथा उपर्युक्त पूज्य स्वामीजीने भी प्रूफ देखकर उचित एवं आवश्यक संशोधनमे पूर्ण सहायता की। इन सब महानुभावोंके अथक परिश्रम और सहयोगसे आज यह ग्रन्थ पाठकोंके समक्ष इस रूपमें उपस्थित हो सका है। इस ग्रन्थकी व्याख्या लिखते समय मेरे पास हिन्दी या अन्य किसी भारतीय भाषाकी कोई पुस्तक नहीं थी। संस्कृत भाषाके आठ ग्रन्थ मेरे पास थे, जिनसे मुझे बहुत सहायता मिली और एतदर्थ मैं उन सभी व्याख्याकारोका कृतज्ञ हूँ। उक्त ग्रन्थोंके नाम इस प्रकार हैं—( १ ) श्रीशङ्कराचार्यकृत शारीरक-भाष्य, ( २ ) श्रीरामानुजाचार्यकृत श्रीभाष्य, ( ३ ) श्रीवल्लभाचार्यकृत अणुभाष्य, ( ४ ) श्रीनिम्नार्कभाष्य, ( ५ ) श्रीभास्कराचार्यकृत भाष्य, ( ६ ) ब्रह्मानन्ददीपिका, ( ७ ) श्रीविज्ञानभिक्षुकृत भाष्य तथा ( ८ ) आचार्य श्रीरामानन्दकृत व्याख्या। पाठक मेरी अल्पज्ञतासे तो परिचित होगे ही; क्योंकि पहले योगदर्शनकी भूमिकामें मैं यह बात निवेदन कर चुका हूँ। मैं न तो संस्कृतभाषाका विद्वान् हूँ और न हिन्दी-भाषाका ही। अन्य किसी आधुनिक भाषाकी भी जानकारी मुझे नहीं है। इसके सिवा, आध्यात्मिक विषयमें भी मेरा विशेष अनुभव नहीं है। ऐसी दशामें इस गहन शास्त्रपर व्याख्या लिखना मेरे-जैसे अल्पज्ञके लिये सर्वथा अनधिकार चेष्टा है, तथापि अपने आध्यात्मिक विचारोंको दृढ़ बनाने, गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करने तथा मित्रोंको संतोष देनेके लिये अपनी समझके अनुसार यह टीका लिखकर इसे प्रकाशित करानेकी मैने जो धृष्टता की है, उसे अधिकारी विद्वान् तथा संत महापुरुष अपनी सहज उदारतासे क्षमा करेंगे; यह आशा है। वस्तुतः इसमें जो कुछ भी अच्छापन है, वह सब पूर्वके प्रातःस्मरणीय पूज्य- चरण आचार्यों और भाष्यकारोंका मङ्गलप्रसाद है और जो त्रुटियाँ हैं, वे सब मेरी अल्पज्ञताकी सूचक तथा मेरे अहङ्कारका परिणाम है। जहाँतक सम्भव हुआ है, मैंने प्रत्येक स्थलपर किसी भी आचार्यके ही चरणचिह्नोंका अनुसरण करने- की चेष्टा की है। जहाँ स्वतन्त्रता प्रतीत होती है, वहाँ भी किसी-न-किसी प्राचीन महापुरुष या टीकाकारके भावोंका आश्रय लेकर ही वैसे भाव निकाले गये हैं। अनुभवी विद्वानोंसे मेरी विनम्र प्रार्थना है कि वे कृपापूर्वक इसमे प्रतीत