ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ प्राप्तिरूप फल बताया है, वह कथन स्वर्गलोककी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे है, ऐसा समझना चाहिये । सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ३ । ३ । ४८ ॥ दर्शनात्=श्रुतिमे जगह-जगह ब्रह्मज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्तिका वर्णन देखा जानेसे; च=भी ( यही दृढ़ होता है ) । व्याख्या—श्रुतिमे यज्ञादि कर्मोंका फल स्वर्गलोकमें जाकर वापस आना ( मु० उ० १ । २ । ९, १० ) और ब्रह्मज्ञानका फल जन्म-मरणसे छूटकर परमात्माको प्राप्त हो जाना ( मु० उ० ३ । २ । ५, ६ ) बताया गया है, इससे भी यही सिद्ध होता है कि एकमात्र ब्रह्मविद्या ही मुक्तिमे हेतु है, यज्ञादि कर्म नहीं । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पूर्वपक्षका उत्तर देते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— श्रुत्यादिबलीयस्त्वाच्च न बाधः ॥ ३ । ३ । ४९ ॥ श्रुत्यादिबलीयस्त्वात्=प्रकरणकी अपेक्षा श्रुतिप्रमाण और लक्षण आदि बलवान् होनेके कारण; च=भी; बाधः=प्रकरणके द्वारा सिद्धान्तका बाध; न= नहीं हो सकता । व्याख्या—वेदके अर्थ और भावका निर्णय करनेमे प्रकरणकी अपेक्षा श्रुतिका वचन और लक्षण आदि अधिक बलवान् माने जाते हैं, इसलिये प्रकरणसे सिद्ध होनेवाली बातका निराकरण करनेवाले बहुत-से श्रुतिप्रमाण हों तथा उसके विरुद्ध लक्षण भी पाये जायँ तो केवल प्रकरणकी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह सिद्धान्तमें बाधा उपस्थित कर सके । इससे यही सिद्ध होता है कि परमात्माका साक्षात् करनेके लिये बताये हुए उपासनादि उपाय अर्थात् ब्रह्मविद्या ही परमात्माकी प्राप्ति और जन्म-मरणसे छूटनेका साधन है, सकाम यज्ञ आदि कर्म नहीं। सम्बन्ध—अब श्रुतिमें बताये हुए ब्रह्मविद्याके फलभेदका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। सभी ब्रह्मविद्याओंका उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करा देना और इस जीवात्माको सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्त कर देना है, फिर